कविता – जसवीर सिंह हलधर

मिला खून माटी उगाता हूँ दाने,यही साधना मैं इसी का पुजारी ।
नहीं धूप देखूँ नहीं छांव देखूँ , पड़े पाँव छाले नहीं है सवारी ।।

मरूँ भूख से या चवा जाय कर्जा , नहीं रात देखूँ न देखूँ सवेरा ।
न देखा उजाला न खाया निवाला ,फिरूँ रात भागा यही काम मेरा ।।

यहाँ कर्ज से कौन जीता कहाँ है ,यहाँ भूख से कौन हारा नहीं है ।
न नेता न मंत्री न कोई मिला है ,पड़ा आन सूखा सहारा नहीं है ।।

उगायी फसल जो हुए भाव मिट्टी,फसा बीच धारा किनारा नहीं है।
न आसूं न आहें न कोई गिला है, भले ही यहाँ पे गुजारा नहीं है ।।

करूँ काम खेती नहीं भीख मागूँ ,कुआ रोज खोदूँ पिऊँ रोज पानी ।
चिता लेट जाऊँ करूँ आत्म हत्या ,न दाना न पानी यही है कहानी ।।

कभी ना मिला दाम पूरा हमें तो, नहीं रास आयी न भाती किसानी ।
बता दोष मेरा बता बे इमानी , न आया बुढ़ापा जली ये जवानी ।।

लुटा पाग मेरा किसानी लबादा , फटी पाग देखूँ कि वादा निभाऊँ ।
लगाए जो नारा दे झूठा दिलासा , वही खेत खाया किसे ये बताऊँ ।।

फसी नाव मेरी फिरूँ आज हारा , फटी ऐक धोती न धौंऊँ सुखाऊँ ।
कभी रोग खाये कभी बाढ़ आये , लुटा आशियाना कहाँ से बचाऊँ ।।
– जसवीर सिंह हलधर , देहरादून

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