vivratidarpan.com – उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘बुलडोजर’ को सुशासन और त्वरित न्याय के प्रतीक के रूप में पेश किया गया। लेकिन जब विकास की बात आती है, तो ऐसा लगता है कि यह प्रतीकवाद केवल पुराने निर्माणों को ढहाने तक ही सीमित रह गया है। लखनऊ के गोमती नगर में हाल ही में हुआ हादसा,जहाँ ₹1,519 करोड़ की भारी-भरकम लागत वाला ‘ग्रीन कॉरिडोर’ अपने भव्य उद्घाटन के मात्र 48 घंटे बाद ही धंस गया,योगी सरकार के ‘विकास मॉडल’ की इंजीनियरिंग और नैतिकता, दोनों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यह केवल एक सड़क का धंसना नहीं है, बल्कि उस व्यवस्थागत भ्रष्टाचार का सुबूत है जहाँ ‘इवेंट मैनेजमेंट’ को ‘इंजीनियरिंग’ पर वरीयता दी जाती है।
उद्घाटन का उत्सव और मलबे की हकीकत
बीते 13 मार्च 2026 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जिस 28 किमी लंबे सिग्नल-फ्री ‘ग्रीन कॉरिडोर’ (फेज-2) का फीता काटा, उसे राजधानी की यातायात समस्याओं का अंतिम समाधान बताया गया था। दावा था कि यह कॉरिडोर यात्रा समय को 45 मिनट से घटाकर 15 मिनट कर देगा लेकिन 15 मार्च को हनुमान सेतु से निशातगंज के बीच सड़क के सीने पर बना 5 फुट गहरा गड्ढा चीख-चीखकर भ्रष्टाचार की कहानी कह रहा था।
कारण के रूप में 15 साल पुरानी जर्जर सीवर लाइन के रिसाव का हवाला दिया गया, लेकिन वास्तविकता यह है कि स्थानीय निवासियों ने डेढ़ महीने पहले ही इस रिसाव की चेतावनी दी थी। उससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि उद्घाटन से पहले ट्रैफिक पुलिस ने कॉरिडोर के ‘फ्लॉड डिजाइन’ (दोषपूर्ण डिजाइन) पर लिखित आपत्ति जताई थी, जिसे राजनीतिक दबाव में दरकिनार कर दिया गया। जब बुनियादी ढांचा ताश के पत्तों की तरह ढहता है, तो उसे ‘एक्ट ऑफ गॉड’ कहना जनता की बुद्धि का अपमान है, यह स्पष्ट रूप से ‘एक्ट ऑफ फ्रॉड’ है।
मौत के आंकड़ों का ‘उत्तर प्रदेश सेंटर’
2017 में सत्ता संभालते ही मुख्यमंत्री ने संकल्प लिया था कि”15 दिनों में प्रदेश गड्ढा मुक्त होगा।” नौ साल बाद, केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय (MoRTH) के फरवरी 2026 के आंकड़े इस संकल्प की विभीषिका बताते हैं। 2020 से 2024 के बीच, भारत में गड्ढों के कारण हुई कुल 9,438 मौतों में से 5,127 मौतें अकेले उत्तर प्रदेश में हुईं। यह सांख्यिकीय त्रासदी है कि देश की 54% से अधिक ‘गड्ढा-जनित’ मौतें केवल एक राज्य में हो रही हैं। उत्तर प्रदेश में यह ग्राफ 2020 (1,555 मौतें) से बढ़कर 2024 तक 2,385 मौतों तक पहुंच गया,यानी 53% की वृद्धि। विडंबना देखिए, जहाँ आंध्र प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों ने तकनीकी सुधारों से इन मौतों को शून्य के करीब ला दिया है, वहीं उत्तर प्रदेश ‘एक्सप्रेसवे प्रदेश’ होने के बावजूद अपनी जनता को सुरक्षित सड़कें नहीं दे पा रहा है।
निर्माण की गति का तुलनात्मक विश्लेषण
भाजपा सरकार अक्सर राष्ट्रीय राजमार्गों (NH) की लंबाई बढ़ाने का दावा करती है, लेकिन जब हम पिछले 18 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं, तो ‘अभूतपूर्व गति’ का दावा तर्क की कसौटी पर कमजोर पड़ता है।
बसपा शासन (2007-12): तत्कालीन सरकार ने 1,944 किमी NH का निर्माण किया, जो प्रति वर्ष औसतन 388.8 किमी था।
सपा शासन (2012-17): औसत गति 240 किमी/वर्ष रही, लेकिन इस दौरान ‘क्वालिटी एसेट्स’ पर ध्यान था। आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे (302 किमी) महज 22 महीने में बना और इसकी गुणवत्ता ऐसी थी कि इस पर भारतीय वायुसेना के मिराज और सुखोई विमान लैंड कर सकते हैं।
भाजपा शासन (2017-26): 9 वर्षों में लगभग 3,400 किमी का निर्माण हुआ, यानी औसत 377.7 किमी/वर्ष।
इस गणित से स्पष्ट है कि यदि योगी सरकार ने केवल मायावती सरकार की 389 किमी/वर्ष की गति को भी बरकरार रखा होता, तो आज प्रदेश में 100 किमी से अधिक अतिरिक्त सड़कें होतीं। गति की इस मामूली बढ़त के लिए गुणवत्ता के साथ जो समझौता किया गया, उसकी कीमत जनता अपनी जान देकर चुका रही है।
लागत का गणित और ‘संस्थागत भ्रष्टाचार’
सड़क निर्माण की लागत में हुआ उछाल किसी घोटाले से कम नहीं लगता। राजमार्गों के निर्माण की मानक लागत ₹18-22 करोड़ प्रति किमी (भूमि अधिग्रहण छोड़कर) होनी चाहिए। लेकिन उत्तर प्रदेश में परियोजनाओं की लागत रहस्यमयी ढंग से बढ़ जाती है।
पूर्वांचल एक्सप्रेसवे: इसकी लागत ₹23,000 करोड़ के पार पहुंच गई (लगभग ₹66 करोड़/किमी), जबकि यह पहली ही बारिश (जुलाई 2022) में सुल्तानपुर के पास धंस गया था।
इसकी तुलना में चेन्नई जैसे तटीय क्षेत्रों में जटिल फ्लाईओवरों की लागत भी ₹120-130 करोड़ प्रति किमी रहती है, जबकि यूपी के मैदानी इलाकों में शहरी सड़कों की लागत बिना किसी भौगोलिक बाधा के बेतहाशा बढ़ाई गई है।
कैग (CAG) की रिपोर्ट (संख्या 5, 2023 और 2025 के प्रारंभिक ऑडिट) ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश में सड़कों के लिए कोई ‘दीर्घकालिक मास्टर प्लान’ नहीं है। प्रस्ताव ‘एड-हॉक’ (तदर्थ) आधार पर पास किए जाते हैं, जिससे लागत में 20-40% की वृद्धि होती है। यदि योगी सरकार ने पिछले शासन की लागत-दक्षता बनाए रखी होती, तो करदाताओं के कम से कम हजारों करोड़ बचाए जा सकते थे।
ग्रीन विजन की बलि और ग्रामीण उपेक्षा
पूरी दुनिया चाहे वह यूरोप हो या चीन शहरी परिवहन में साइकिल और पैदल पथ (Green Mobility) को प्राथमिकता दे रही है। उत्तर प्रदेश में इसके उलट हुआ। लखनऊ और अन्य शहरों में बनाए गए आधुनिक साइकिल ट्रैक को इस सरकार ने “ट्रैफिक में बाधा” बताकर नष्ट कर दिया या उपेक्षित छोड़ दिया।
ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति और भी भयावह है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत बनी सड़कें भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही हैं। मार्च 2026 में पीलीभीत और फर्रुखाबाद से आई मीडिया रिपोर्टों ने दिखाया कि ग्रामीणों ने अपने हाथों से नई बनी सड़कों की ऊपरी परत को उखाड़ दिया। यह ‘घटिया निर्माण’ ठेकेदारों और अधिकारियों के बीच गहरे गठजोड़ का परिणाम है।
धरातली विकास की उपेक्षा
सरकार का ध्यान ‘समान विकास’ के बजाय ‘चुनिंदा प्रतीकों’ पर केंद्रित है। 2026 के बजट में काशी के लिए ‘रिवर पोर्ट’ और सात हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर के लिए भारी आवंटन किया गया है। लेकिन जहाँ उत्तर प्रदेश की 70% आबादी रहती है,उन ग्रामीण इलाकों के स्वास्थ्य केंद्र और स्कूल जर्जर सड़कों के कारण पहुंच से बाहर हैं।
महाकुंभ 2025 में ‘AI-सक्षम सुरक्षा’ के दावों की पोल 29 जनवरी 2025 को हुए स्टैंपेड (भगदड़) में खुल गई, जहाँ 30 से अधिक लोगों की मौत हुई। सरकारी दावा 27,000 कैमरों का था, लेकिन जांच में सक्रिय कैमरों की संख्या मात्र 328 निकली।
जवाबदेही किसकी?
उत्तर प्रदेश का वर्तमान ढांचागत विकास एक ऐसी इमारत की तरह है जिसका पेंट तो चमकदार है, लेकिन नींव रेत पर रखी गई है। जब विकास के नाम पर बनी सड़कें उद्घाटन के दो दिन बाद धंसने लगें और जब गड्ढे एक दशक में पांच हजार से ज्यादा लोगों को निगल जाएं, तो इसे सुशासन नहीं कहा जा सकता।
भाजपा सरकार का मॉडल फिलहाल नारों के शोर में अपनी नाकामियों को छिपाने का प्रयास कर रहा है। और उपलब्धियों का डंका बजा रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि गड्ढों और झूठ को व्हाट्सएप फॉरवर्ड से नहीं भरा जा सकता। यह महज प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और उनके पैसों के साथ किया गया एक संगठित ‘धोखा’ है। (विभूति फीचर्स)
