भोजपुरी पूर्णिका – श्याम कुंवर भारती

सुने पतझड़ दिल में बन के बहार आ जइता । ना ना कईके जान अब त हमार हो जइता ।   बेचारा दिल मनाई त मनाई कइसे हम बोला। पियासल…

गोबर संवाद – प्रियंका सौरभ

कभी रिसर्च की चुप्पी में, दीवारों पर गोबर उतरा। तो कभी प्रतिरोध की गर्मी में, वही गोबर उल्टा फेरा।   मैडम बोलीं — ‘ये संस्कृति है’, छात्र बोले — ‘ये…

कभी न हो मंदा, चंदा उगाही का धंधा (व्यंग्य) – सुधाकर आशावादी

vivratidarpan.com –  समाज में अच्छे काम करने वालों की कमी नहीं है। देश का बुद्धिजीवी भले ही घर खर्च की चिंता न करे, मगर समाज की चिंता उसे लगी रहती…