नियति और यांत्रिक ख़ामियों के बीच असुरक्षित यात्राएँ – डॉ. सुधाकर आशावादी

vivratidarpan.com – सभ्य समाज जीवन की मौलिकता से दूर होता जा रहा है । जीवन भी यंत्र सरीखा हो गया है। समझ नहीं आता कि नियति का सम्मान करें या…

एक कागज को फाड़ देने से क्या होगा ? – गुरुदीन वर्मा

  एक कागज को फाड़ देने से क्या होगा, मैंने तो तेरा एक इतिहास लिख दिया है। एक तस्वीर को तोड़ देने से क्या होगा, मैंने तो तेरा दिल ही…

पंचायत चुनाव – पूजा मेहरा

  बिगुल चुनावी बज गया , लम्बी लगी कतार, टिकट जुगाड़ू सक्रिय, वादों की बौछार। टिकट जिसका कट रहा, मिमियावे चहु ओर, जिसकी लग रही लॉटरी, वह है आत्मविभोर। कोई…