हो जिनका भी आवारा मन – अनुराधा पाण्डेय

हो जिनका भी आवारा मन,

वे सुने ! उन्हें मैं कहती हूँ ।

कुछ तन तो ब्याहे होते हैं ।

कुछ मन चिर ब्याहे होते हैं ।

 

मन आँगन हो जब हरा -भरा,

फिर सूना कोना कहाँ बचा ?

क्या जम सकता फिर पेड़ नवल,

यह संभव होना कहाँ बचा ?

मन का माली नित साफ करे-

जो तृण अनचाहे होते हैं ।

कुछ मन चिर—

 

कवि लिखता बेशक महाकाव्य,

है रच जाती बहु इड़ा श्रद्धा ।

पर दमित काम हित मरने तक,

है बच जाती बहु इड़ा श्रद्धा ।

रोके जो मन की मरु भटकन-

अच्छे चरवाहे होते हैं ।

कुछ मन चिर—

 

जो फेंक चले सिर सघन-धूप,

हर साया पर झुक जाते हैं ।

है मंजिल उनको कहाँ मिली ,

हर मोड़ पे जो रुक जाते हैं ।

मंजिल तक जाती एक राह-

चौपट दोराहे होते हैं ।

कुछ मन चिर –

 

जो अपने मन को फुसलाते,

देकर शब्दों के निजी अर्थ ।

सच कहती हूँ, वे बो लेते ,

मन की मिट्टी में बीज व्यर्थ ।

जमते कब हैं वे पौध अमित –

जो मन ने चाहे होते हैं ।

कुछ मन चिर –

 

कुछ मन चिर ब्याहे होते हैं ।

कुछ तन तो ब्याहे होते हैं ।

वे !सुने उन्हें मैं कहती हूँ ।

हो जिनका भी आवारा मन

-अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका, दिल्ली

 

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