दहन होलिका करके सारे, खेल रहे हैं फाग ।
शायर सब प्रेमिल धुन में , गा रहे होली राग ।।
छन्न पकैया छन्न पकैया छन्न के ऊपर चंदा।
अगला छन्न मैं तब कहुँ जब तवज्जो दे हर बंदा ।।
दून में खूब अब सजे , श्रीकान्त तिरे रंग।
सबसे बरजोरी करे , मचा रहा हुड़दंग।।
हुड़दंगों की टोली आई, लेकर बाजा ढोल ।
प्यारी बहना इंदु जी , आज हो गईं गोल।।
मंजू जी का सर ऊँचा , हँसी में है कमाल।
उम्र भले हो ६ दशक, दिल है सोलह साल ।
भांग पीकर कवियों की , कैसी बिगड़ी चाल।
कविता का रुप देख के , हुए सभी बदहाल ।।
देखो भरते रोज़ ही, ग़ज़ब-गजब के स्वाँग।
हलधर जी भरें लोटा, खूब चढ़ाते भाँग।।
दौड़ आत शिव मोहना ,ले ठण्डाई हाथ ।
खड़ी द्वार है बहुरिया ,लट्ठ लिये है साथ।।
सुनाती है फाग उषा,कहती हृद-उद्गार।
मार सोंटी कहें क्षमा , होली बस लठमार।।
मणि जी ले कर आ गयीं , गुझिया वाले थाल।
महिमा देवें प्यार से , बिगड़े सबके हाल ।।
मीरा पकौड़ियाँ तलें , करें सब इंतजाम।
कोका कोला पी रहीं , भाँग का नहीं नाम ।।
रौनक मेला है लगा , नीरू मौलस्री संग।
खुशियां भरें जीवन में ,होली के ये रंग।।
शाएरात की भीड़ है,अजब गजब से रंग।
अम्बर भई ग़ज़ल पढ़ें, झूमें पीकर भंग।।
-डा. इंदु अग्रवाल, देहरदून , उत्तराखंड
