होगा सिर्फ उल्लास – नीलांजना गुप्ता

 

लोग कहते हैं कि दुनियाँ,

होती जा रही है उदास,खामोश।

डूबते हुए सूरज के साथ,

मैंने भी कुछ ऐसा ही सोचा और

निकल पड़ी उदासी की तलाश में।

मैदान के प्राँगण में

किलकारियाँ भरता बचपन का समूह

जिनके चेहरों से फूटी पड़ती थी हँसी

नही पा सकी मैं उदासी।

आकाश में कलरव करते पक्षियों के झुंड

नन्हीं टहनियों के घोसलों में

चहकते बच्चे ,उल्लास से भरपूर।

यहाँ भी नहीं पा सकी मैं उदासी।

साँझ गहराई,

मैं समझी शायद उदासी आई।

लेकिन तभी असंख्य झिलमिलाते हुए तारे

जैसे मुस्कराकर कहने लगे मुझसे,

उदासी बाहर कहीं नहीं

तुम्हारे मन में है।

तुम इक्कीसवीं सदी के इंसानों ने,

हाँ, सिर्फ इंसानों ने ही,

सहेज कर रखा है इसे।

तुम मासूम बनकर नहीं डूब सकते,

किलकारियों की गूँज में।

तुम पंछी बनकर

नहीं कर सकते मधुर कलरव

खुले आकाश में।

क्योंकि तुम्हारा आकाश दायरों में बंधा है

जिस रोज तुम हो जाओगे मासूम,

तोड़ दोगे आकाश के इन दायरों को,

उस दिन गूँज उठेगी चहक!

और तब उदासी कहीँ नहीं होगी।

होगा सिर्फ उल्लास! उल्लास ही उल्लास!

– नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश

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