एक दिन अचानक चौराहे पर
मेरी एक मुर्दे से मुलाकात हुई
वह चलता, फिरता मुर्दा अच्छे नम्बरों से स्नातक था
मानवीय गुणों से भरपूर, सुंदरता का धनी।
किन्तु अफ़सोस! वह मुर्दा ही तो था।
जिसकी भावनायें मर चुकी थीं।
जीवन के प्रति उत्साह मर चुका था।
जिसका व्यक्तित्व बेरोजगारी के अंधेरे में खो चुका था
बचा था तो सिर्फ हड्डियों का ढांचा।
जिसको जीवन के ऊबड़-खाबड़ पथ पर,
घूम रहा था वह वहन किये हुए।
संघर्ष के काले बादलों से घिरी हुई वह लाश,
समय की कब्र को फोड़कर,
एक आशा का दीपक लिए,
कब्रिस्तान को ही वादियाँ समझ कर भटक रही थी
एक इंसान की खोज में।
एक ऐसा मनुष्य जो दे सके उसे चेतना की आग।
पैदा कर सके उसके सीने में विश्वास की धड़कन
किन्तु अफ़सोस!
हर कदम पर वह जिन्दा लाशों से ही टकराया।
जो इस दुनियाँ रूपी कब्रिस्तान में,
लक्ष्यहीन मड़रा रहीं थीं।
– नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश
