हमको बहुत खीस बड़ता है,
और कभी मन अनसा भी जाता है,
लेकिन जब दुआरे कोई आ जाता है,
बिना चाय पिए, पकौड़ी खिलाए—नहीं भेजा जाता है।
और उतने पे ही कहाँ काम चलता,
जब तक न परोसें दाल-चावल,
पुआ-पूड़ी, दही-पापड़, चटनी-तरकारी,
अतिथि को भर लेते हैं अकवारी
काहे कि हम हैं बिहारी।
जब पाहुन घर आते हैं तो,
पिताजी का एक पाँव दुकनवे पर रहता है,
और वो पाहुन खाली एक घर नहीं,
सौंसे मोहल्ले का हो जाता है
सब करने लग जाते हैं उनकी तिमारदारी,
का है कि हम हैं न बिहारी।
जब पाहुन दीदी को विदा कर ले जाते हैं,
तो उस दिन घर में झाड़ू नहीं लगाया जाता,
काहे कि बेटी को हम लक्ष्मी कहते हैं,
लक्ष्मी जाए तो घर नहीं बुहारा जाता
हम ऐसे निभाते हैं धर्म हमर कुल्ह बिरादरी
काहे कि हम हैं बिहारी।
और यहाँ के जितने विद्वान हैं,
गणितज्ञ, राजनीतिज्ञ, महर्षि, संत,
कवि-कवयित्री कौन है उनसे अनभिज्ञ,
जो अकेले ही सब पर पड़ जाए भारी,
उसको ही कहते हैं—बिहारी।
हमको दो शब्द लगते अति प्रिय
जब चाय बेकार बने तो कह दें,
“राम-राम! कितना पनछुछुर चाय है!”
और जब बहुत कुछ खाने को हो,
पर मनपसंद न मिले तो बोलें
“माँ, सब छुच्छे है!”
बिहारी होने पर गर्व है, और सदा रहेगा
काहे कि दिल से जीते हैं।
हम हैं बिहारी।
– सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर
