स्वीकार करने का मन नही – अनुराधा पाण्डेय

 

अब तुम्हें स्वीकार करने का हमारा मन नहीं है ।

धत! तुम्हारे प्रीत का हिस्सा रहे यह भूल जाना।

पूर्व जीवन के कभी किस्सा रहे यह भूल जाना।

नेत्र में तब बो दिए थे अंकुरण हित कोटि सपने।

किन्तु पतझर से डरे तुम दे गये दृग सिंधु अपने।

क्या तुम्हें निर्दोष उपवन का दिखा वह तन नहीं है ।

अब तुम्हें स्वीकार करने का हमारा मन नहीं है ।

 

क्यों तुम्हारे प्रीत स्यंदन पर बिना सोचे चढ़े हम ।

और बिन सोचे बिचारे प्रीत पथ पर जा बढ़े हम ?

जादुई कुछ शक्ति के वश,पल्लवित यौवन हुआ था।

आह! पियराये जड़ों ने ज्यों शिशिर का मन छुआ था ।

अब मधुरता थामने की किन्तु पागलपन नहीं‌ है ।

अब तुम्हें स्वीकार करने का हमारा मन नहीं है ।

 

कर प्रणय अवहेलना तुम,जा चुके जब इस हृदय से ।

हाय ! निर्दय चल दिये तुम  तोड़ कर सम्बन्ध भय से।

चाहकर कुम्हला न पाया है अभी तक बंध मृण्मय।

काम शर का कोष भी मन कर न पाया प्राण! मन्मय।

प्राण विनिमय में लगे मन आज वो उपवन  नहीं है!

अब तुम्हें स्वीकार करने का हमारा मन नहीं है।

– अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका दिल्ली

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