हमने स्वयं को ढूंढा नहीं,
गुम रहने में ज्यादा सुकून था,
हमने ओझल नयन कर लिए,
और रास्ते गुमनाम कर लिए,
अकेले चलने में मजा कुछ और था,
अनुत्तरित रह कर संभाल लिए,
वो प्रश्न जो चुभ सकते थे,
गम को छुपा लिया चेहरे की परतों में,
अब मुस्कारने में बोझ कम था,
जीने की आदत लगा ली,
धूप से दोस्ती पक्की कर ली,
भले सिर पर आसमान कम था,
– रश्मि मृदुलिका, देहरादून
