स्मृतियों की दीमक – रेखा मित्तल

दीमक शायद पढ़ना

जानती थी

तभी चाट गई

अलमारी में रखी किताबों को

बहुत ही बेरहमी से

ताकि कोई दोबारा

उन्हें पढ़ न सके

तुम कहते ही रहे

पर पढ़ न पाए

मेरे एहसासों को

जो दफन थे

इन किताबों के पन्नों पर

शब्दों के भीतर

स्याही से भीगे

खोखला कर गई

सब किताबों को

चट कर गई

मेरी भावनाओं को

शायद सही ही किया

तुम समझते भी

कहाँ थे?

तुम्हारे पास मेरे लिए

समय भी तो नहीं था

स्मृतियों को भी

कर गई विस्मृत

व्यक्तित्व के साथ साथ

मेरे अस्तित्व को भी

कर गई  बौना

दीमक कई मायनों में

बहुत कुशल होती हैं

खोखला करने का कार्य

बड़ी शिद्दत से करती हैं

आखिर में कुछ नहीं बचता

बस केवल मिट्टी के कण रह जाते हैं

–रेखा मित्तल, चंडीगढ

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