मुड़ जाती हैं स्त्रियां
बार बार उन रास्तों पर
जहां वह रुसवा हुई
नहीं तलाश पाती अपने लिए
एक नया आसमान
ऐसा प्रेमवश
कतई नहीं
पर शायद उन्होंने
देखी नहीं कोई और दुनिया
उड़ना सीखा सीमाओं में ही
पुरुष क्यों नहीं
पढ़ पाते
उस मुड़ती हुई
स्त्री का मन
जो चाहकर भी
नहीं लांघ पाती सीमाएं
स्त्री नहीं चाहती
तोड़ना उस बंधन को
जो था अनचाहा
निभाती हैं उसको
थोड़ा बहुत चाहकर
रेखा मित्तल , चण्डीगढ़
