Vivratidarpan.com – सोहम ने बचपन में अपनी मां से बहुत सारी बातें सुनी थीं कि उनका जीवन बहुत कष्टों से बिता था। स्कूल नहीं जा पाई थीं बहुत सारे भाई बहन पूरा चाचा का परिवार भी साथ रहता था। कभी कोई चीज़ आती थी तो सभी को बांट कर ही मिलती थीं। इस तरह उन्हें हर बात से कुछ न कुछ सीखने को भी मिल जाता था। पिताजी माताजी दादा जी के साथ खेती में काम करने जाते थे। मां ने कभी कोई चीज़ की जिद नहीं की थी। शादी के बाद भी वहीं पहले की तरह जीवन बीतने लगा। पर अब वो मेरे लिए बहुत परेशान रहने लगी। क्यों की अब वो मेरे जीवन में कोई भी कमी न रह जाएं और मैं अपने जीवन में कुछ बन सकूं। वो हमेशा इसी फिक्र में रहती थी। मगर यहां पापा को किसी बात से कुछ लेना देना नहीं था। वो अपने जीवन में बहुत खुश थे। सभी लोगों को सुनते समझते थे। घर के लिए वो एक सम्माननीय व्यक्ति थे। एक दिन उन्हें कही किसी काम से बाहर जाना पड़ा। तभी उसने नोटिस किया कि सभी लोग मां से ठीक व्यवहार नहीं करते हैं। अब सोहम पांचवीं में पढ़ रहा था। उसने स्कूल से घर लौट कर मां को रोते हुए देखा। थोड़ा समझ में आ गया था कि आज मां को फिर कुछ कहा गया है। उसने कुछ नहीं बोला दूसरे दिन वो स्कूल नहीं गया और पूरे दिन मां के साथ रहा। देखा मां को सुबह से ही ताने सुनाए जा रहे थे। कुछ भी घर से दहेज में नहीं लाई है। सभी चीजे जो रोज लगती थी तेल साबुन हटा दी गई थीं। खाने की रोटी दाल भी नहीं होती थी। पर अब वो अपनी मां को दुखी नहीं देखना चाहता था। उसने मां को समझाया कि पापा से वो सब कह देगा। पर मां ने मना कर दिया। कि वो सब कुछ जानते है। उन्हें हर बात का पता है वो कुछ नहीं कर सकते है। क्यों की वे खुद दादा दादी के बिजनेस को संभाल रहे थे। उन्हें उनके घर में उनकी कोई आवाज नहीं थी। अब वो समझ गया कि उसे बहुत मेहनत करना है पढ़ लिख कर कुछ बनना होगा। उसने ठान लिया और वो एक दिन बहुत बड़ा आई० ए० एस० ऑफिसर बना। उसने अपनी मां को उस नर्क के जीवन से बाहर निकाला। ऐसे सोहम ने अपने जीवन में मां को वो सब कुछ दिया जिसका उसे हक था। होनहार सोहम ने अपने जीवन का लक्ष्य पूरा किया। मां के सब दुःख दूर कर दिए ।
– जया भराड़े बड़ोदकर, टाटा सीरी न।, टावर १A।, ठाणे, मुंबई (महाराष्ट्र)
