हम गर्व से कहते फिरते हैं, बच्चा मेरा ‘कान्वेंट’ जाता है,
ए.बी.सी.डी. जब वो बोले, तब मन बड़ा हर्षाता है।
तब रीत नहीं आड़े आती, न ही संस्कृति घबराती है,
जब बारी आए उत्सव की, तब क्यों मर्यादा याद आती है?
शिक्षा अगर है ‘इंग्लिश’ अच्छी, तो तारीखें क्यों बुरी हुई?
जब ज्ञान लिया उस भाषा से, तो खुशियाँ क्यों अधूरी हुई?
ये दोहरी सोच ही बाधा है, उन्नति की हर राहों में,
क्यों बाँध रहे हो खुशियों को, संकीर्ण सी इन बाहों में?
चैत्र की पूजा मंदिर में, मन को शांति पहुँचाती है,
पर जनवरी की वो पिकनिक, रिश्तों को पास बुलाती है।
पूरा परिवार जब साथ मिले, तो वो पल ही त्यौहार है,
जो अपनों को अपनों से जोड़े, वही साल का सार है।
साल बदलता है बस कैलेंडर, सूरज वही पुराना है,
पर साथ बैठ कर हँसने का, मिलता एक बहाना है।
मत ठुकराओ उस खुशी को, जो अपनों के मुख पर आई है,
ये नए दौर की नयी रीत, खुशियों की एक अंगड़ाई है।
नया वर्ष भी अपना है, और चैत्र भी अपना मान है,
एक तरफ है आधुनिकता, दूजी ओर स्वाभिमान है।
जो देश को जोड़े, दिल को जोड़े, वही रीत महान है,
हर मौसम में खुश रहना ही, सच्चे ‘हिन्द’ की शान है।
-ज्योती वर्णवाल, नवादा, बिहार
