सुबह के इंतजार में सिमटी सी कली थी मैं…
रजनी का दुशाला लिए सूरज से मिलने चली थी मैं …
थी आभा मुख पर, अधरों पर थी कोमलता …
मन श्वेत सा शुद्ध और तन सुगंध सा महकता …
वो चलती प्यारी, मनभावन, सुहानी सी बयार…
वो इठलाती हर पंखुरी,थी खिलने को तैयार…
अनजाने रंगों ने मेरा अम्बर बुना,
पखेरूओं ने भी अपना आकाश चुना…
उभरते हुए मंदार को देख मन ही मन मचली थी मैं…
सुबह के इंतजार में सिमटी सी कली थी मैं….
-विनीति शर्मा,ग्रेटर नोएडा, उत्तर प्रदेश
