सिन्दूर: अब श्रृंगार नहीं, शौर्य का प्रतीक – प्रियंका सौरभ

 

सिन्दूर की बिंदिया, न अब बस चुप्पी का श्रृंगार,

यह ज्वाला की लाली है, नारी का जयघोष, आत्माभिमान का पुकार।

वह रक्तिम रेखा जो केवल प्रेम का वचन नहीं,

यह प्रचंड नारी का मौन विद्रोह, उसका अनमोल सम्मान है।

 

जब वियोमिका और सोफिया ने उठाई तलवार,

मौन बंधन टूटे, कंगनों की खनक में उठी रण की पुकार।

न चूड़ी थमी, न मांग झुकी, न पांव रुके,

यह सिन्दूर ज्वाला की लकीर, कर्तव्य की हुंकार।

 

यह नहीं केवल श्रृंगार की परंपरा,

यह है हर स्त्री की यात्रा, उसके अदृश्य आंसुओं का इकरार।

रानी लक्ष्मीबाई, दुर्गावती, पद्मावती की कहानियाँ,

हर युग में यह सिन्दूर बना उनकी शक्ति का संज्ञान।

 

आज की नारी भी वही ज्वाला है,

उसके लहू से रंगी है इतिहास की हर कविता की माला।

यह सिन्दूर है संघर्ष का गीत, बलिदान की महागाथा,

यह है नारी के हौसले की अनुगूंज, उसकी आत्मबल की वाणी।

 

तो सिन्दूर न अब बस श्रृंगार,

यह स्वाभिमान, साहस और आत्मबल का श्रृंगार है।

यह है नारी की जुबां, उसकी हिम्मत की पहचान,

यह है उसके अस्तित्व की अमर कहानी।

-प्रियंका सौरभ 333, परी वाटिका,  कौशल्या भवन,

बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा – 127045

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