सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण के नाम पर निशाना बनती सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर – मनोज कुमार अग्रवाल

vivratidarpan.com – सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों, विशेष कर महिलाओं को कथित सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण के नाम पर तेजी से निशाना बनाया जा रहा है। हाल ही में एक घटनाक्रम में बठिंडा की सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर कंचन कुमारी, जिन्हें कमल कौर भाभी के नाम से भी जाना जाता है, की निर्मम हत्या कर दी गई। यह हत्या हमें इस बात की याद दिलाती है कि कथित नैतिकता के नाम पर किया जा रहा विरोध , जो कभी ऑनलाइन ट्रोलिंग तक सीमित था, अब हिंसक आपराधिक गुंडई और आतंकवाद में बदल गया है। इस सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की हत्या को अंजाम देने वाला कथित मास्टरमाइंड अमृतपाल सिंह मेहरों, कथित तौर पर कौम दे राखे नामक एक कट्टरपंथी समूह का प्रमुख बताया जाता है। जिसने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर द्वारा प्रसारित की गई सामग्री को कथित तौर पर अनैतिक कृत्य के रूप में दर्शाते हुए हत्या को सही ठहराने का प्रयास किया है। इतना ही नहीं, हत्याकांड के बाद संयुक्त अरब अमीरात भागने के बाद हत्या को सही ठहराते हुए, एक वीडियो को जारी करना, संकीर्ण मानसिकता का दुस्साहस ही दर्शाता है। निस्संदेह, यह मामला संकीर्णता के पोषक और कट्टरपंथी तत्वों की सोच से अलग नहीं है। यह उस दुराग्रही सोच की कड़ी का ही हिस्सा है, जो हिंसा और धमकियों के माध्यम से महिलाओं की अभिव्यक्ति पर सोशल पुलिसिंग के जरिये शिकंजा कसने की कोशिश में रहती है।
इससे पहले भी 28 जून 2022 को राजस्थान के उदयपुर में एक हिन्दू टेलर कन्हैयालाल की हत्या भारतीय जनता पार्टी की प्रवक्ता नूपुर शर्मा के समर्थन में एक सोशल मीडिया पोस्ट साझा करने के लिए की गई थी , जिनकी टिप्पणियों के कारण 2022 में मुहम्मद पैगम्बर को लेकर की गई टिप्पणी पर विवाद हुआ था । हमलावरों ने कन्हैया लाल की दुकान में ग्राहक बनकर प्रवेश किया फिर उसकी नृशंसता से हत्या कर दी। इस हत्या के वीडियो बना कर इंटरनेट पर पोस्ट किए गए थे, जिसमें दो कथित हमलावर कसाई के चाकू पकड़े हुए थे और हत्या की ज़िम्मेदारी लेते हुए खुद की पहचान मुहम्मद रियाज़ अत्तारी और मुहम्मद गौस के रूप में कर रहे थे। अब इस मामले के दो मुख्य आरोपियों को हाइकोर्ट से जमानत पर रिहा कर दिया गया है। कमल कौर की हत्या भी कन्हैया लाल कांड की पुनरावृत्ति है।
आए दिन देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग कट्टरपंथी अपराधी व आतंकी समूहों द्वारा धर्म या पंथ या संस्कृति और नैतिकता के रखवाले बनकर ऐसे कृत्यों को अंजाम दिया जाता रहा है। पिछले दिनों बेंगलुरू में भी एक महिला सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर को केवल उसके पहनावे को अभद्र बताते हुए एसिड हमले की धमकी दी गई। इस धमकी भरे वीडियो के वायरल होने के बाद उस व्यक्ति को उसके नियोक्ता ने नौकरी से निकाल दिया।
यह विडंबना ही है कि कभी ऐसे मामले पाकिस्तान व अफगानिस्तान में महिला सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों को लेकर सामने आते थे। अब भारत में कथित सांस्कृतिक धार्मिक शुचिता व नैतिकता के नाम पर ऐसे हमले किए जा रहे हैं। एक अन्य खतरनाक घटना में, एक लोकप्रिय यूट्यूब शो में दिखाई देने वाली एक डिजिटल निर्माता अपूर्वा मुखीजा को बलात्कार और जान से मारने की ऑनलाइन धमकी दी गई। इस पर राष्ट्रीय महिला आयोग ने हस्तक्षेप करते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की। निस्संदेह, इन लोगों का रवैया बता रहा है कि इस तरह की वारदातों के पीछे एक तय एजेंडा काम कर रहा है जिसका लक्ष्य कथित नैतिकता के संरक्षण के नाम पर हिंसा कर आतंक की नई फसल को तैयार करना है । सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों, विशेष कर महिलाओं को कथित सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण के नाम पर तेजी से निशाना बनाया जा रहा है। सवाल उठता है कि उनके इन मूल्यों को कौन परिभाषित करता है और किसने उन्हें इस सतर्कता को लागू करने का अधिकार दिया । बठिंडा की दुर्भाग्यपूर्ण घटना की पंजाब महिला आयोग ने निंदा करके सही कदम उठाया है, लेकिन केवल आधिकारिक निंदा पर्याप्त नहीं है। कानून प्रवर्तन एजेंसियों को ऐसे मामलों को सुनियोजित अपराधों के रूप में दर्ज करना चाहिए, जो हमारे सामाजिक ताने-बाने को खतरा पहुंचाते हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को भी इस दिशा में जिम्मेदारी उठानी चाहिए कि वे समय रहते सोशल मीडिया के दुरुपयोग रोकें व घृणास्पद सामग्री को अपने प्लेटफॉर्म से हटाएं। साथ ही सोशल मीडिया का दुरुपयोग करने वाले तत्वों पर कड़ी नजर रखें। किसी भी लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी एक अपरिहार्य अंग है। निश्चित रूप से अभिव्यक्ति की आजादी की अपनी सीमाएं भी हैं। हालांकि, यह आजादी आलोचना से प्रतिरक्षा नहीं देती, लेकिन यदि आलोचना किसी की मर्यादा को नुकसान पहुंचाने या हत्या की धमकी में तब्दील होने लगे, तो शासन-प्रशासन को सख्त संदेश देना चाहिए। खासकर डिजिटल सतर्कता बढ़ाने की जरूरत है। विशेषकर जब डिजिटल निगरानी शारीरिक हिंसा में बदलने लगे। जिसे किसी कीमत पर सहन नहीं किया जाना चाहिए। यदि ऐसे मामलों में अभी से सख्ती न दिखाई गई तो समाज में ऐसी हिंसक कार्रवाई की घटनाओं को थामना मुश्किल हो जाएगा।
अब पंजाब के बहुचर्चित कमल कौर उर्फ कंचन कुमारी हत्याकांड में नया मोड़ सामने आया है। इस मामले के मुख्य आरोपी और कथित मास्टरमाइंड अमृतपाल सिंह मेहरो के समर्थन में पोस्टर लगाए गए हैं, जिनमें उसे ‘इज्ज़त का राखा’ बताया गया है। ये पोस्टर लुधियाना-मालेरकोटला रोड स्थित प्रसिद्ध गुरुद्वारा आलमगीर साहिब के पास देखे गए, जिनकी तस्वीरें अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं। पोस्टरों में अमृतपाल सिंह मेहरो को एक धार्मिक व्यक्ति के रूप में पेश किया गया है और उसके खिलाफ चल रही जांच को साजिश बताया गया है। पोस्टर में लिखा गया है कि ‘महिरो ने जो किया वह इज्ज़त की रक्षा के लिए किया’। अब यह मामला जांच एजेंसियों और पुलिस के लिए चिंता का विषय बन गया है। पोस्टर सामने आने के बाद पुलिस को शक है कि आरोपी को बचाने या उसके पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। पुलिस का कहना है कि इस घटनाक्रम पर नजर रखी जा रही है और जिन लोगों ने ये पोस्टर लगाए हैं, उनकी पहचान कर कार्रवाई की जाएगी।
वहीं, अमृतसर की सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर दीपिका लूथरा को जान से मारने की धमकी देने के मामले में पुलिस ने पटियाला से रमनदीप सिंह नाम के व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। आतंकी संगठन बब्बर खालसा और निहंग अमृतपाल सिंह मेहरो और उसके साथियों की तरफ से दीपिका को लगातार धमकियां मिल रही हैं। साइबर थाना पुलिस अमृतपाल सिंह मेहरो और उसके दो साथियों के खिलाफ केस दर्ज कर चुकी है और दीपिका को सुरक्षा के लिए दो गनमैन मुहैया करवा दिए गए हैं।
सवाल यह है कि देश कानून से चलेगा या अपराधिक आतंकी मानसिकता वाले लोग समानांतर खौफ और आतंक का माहौल बना कर लोगों को निशाना बनाएंगे और दहशत का राज कायम करेंगे? क्या अमृत पाल मैहरों जैसे लोग नया भिंडरावाला बनने की फिराक में है? ऐसे लोग समाज में भय और दहशत फैलाने के लिए एक रील बनाने वाली निहत्थी युवती का कत्ल करने कराने में भी गर्व और गौरव समझते हैं। ऐसे असामाजिक आतंकी तत्वों को जितना जल्दी हो सके कानून की नकेल डालकर नियंत्रित करना चाहिए वरना यह समाज के लिए नए नासूर बनेंगे। यहां यह भी बता दें कि इस तरह के मामलों में पुलिस की कमजोर विवेचना और लोक अभियोजकों की कमजोर पैरवी के चलते कन्हैयालाल जैसे नृशंस हत्याकांड के दो प्रमुख आरोपियों को हाइकोर्ट से जमानत मिल जाती है यही वजह है कि हत्यारों के भीतर कानून का कोई भय नहीं रह पाता है। (विभूति फीचर्स)

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