उम्र की इस साँझ में,
जब तुम स्वयं से मिले
पूछो मन के मौन से,
क्यों इतने भ्रम में ढले?
किसे खोजता फिरा मन,
किसकी अधूरी प्यास है?
मृग के अंतर में ही तो
कस्तूरी का वास है।
किसका रखा सहारा?
किससे अब आस है?
हर किसी की राह में
एक अधूरा ‘काश’ है।
ये ‘काश’ यूँ ही रहे,
मन में एक प्रकाश सा
हर चाह पूरी हो गई,
तो क्या बचेगा खास सा?
जो समय है पास में,
उसे सुंदर भाव दो,
जो नहीं है वश तुम्हारे,
उसको निर्मल छाँव दो।
‘काश’ की कामनाओं में
जीवन न खो देना
जो कुछ शेष है हाथ में,
उसको ही संजो लेना।
हँसी के गीत बुनो,
जैसे चलती श्वास है
क्योंकि हर जीवन में
कुछ न कुछ ‘काश’ है।
– सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर
