सरी, तटिनी,, पयस्विनी –  सविता सिंह

 

नहीं है ख्वाहिश की सागर से जा मिलूँ अभी

कुछ और लोगों की प्यास बुझे कुछ और बहुँ मैं अभी।

फेंक दे मानव अपनी उत्कंठा और वेदना इस बहाव में

रुको मत बस बढ़े चलो क्या रखा है ठहराव में।

विसर्जित कर दो सारी गंदगी मुझे नहीं है मलाल

फेको अपने द्वेष विकार और करो कुछ कमाल।

देने के लिए तुम्हें जीवन सदियों से बहती आई हूँ

चट्टानों से गिरती पड़ती फिर भी सिर्फ मुस्काई हूँ।

स्वार्थ तज कर भी औरों के लिए जीना होगा

तटिनी का तो काम है उसे सिर्फ बहना होगा|

थोड़ी देर और बहुँ फिर सागर से जा मिलूँ

कितने प्यासे तकते होंगे उन्हें भी तो जीवन दे दूँ।

सागर से जाकर मिलना ही मेरा है ये धर्म

बहा ले जाऊं तेरी सारी पीड़ा ये भी है कर्म।

हाँ मैं नदी हूँ बहती रहती अविरल कल कल

धो लो अपने सारे मैल रहो तुम भी विमल निर्मल।

– सविता सिंह मीरा जमशेदपुर

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