ज़िंदगी कुछ करते हैं
दृगों के अंजन
बिखरा-सा यह बिसरा मन,
कुछ अधूरी-सी है शायद
शायद ही है यह जीवन।
लट अब ये उलझी-उलझी
कभी-कभी कुछ भी न सूझे,
जाने क्या कहना चाहे यह
रह-रह कर जैसे कुछ यह बूझे।
कैसा चलता रहता है द्वंद्व
उर में उठता अंतर्द्वंद्व,
परिभाषित न हो पाता यह
स्वयं का स्वयं से प्रतिद्वंद्व।
सर्दी की यह गुनगुनी धूप
रवि-सी चमकता यह रूप,
फिर भी कुछ अधूरी-सी है
जाने कैसा यह स्वरूप।
ढूँढे यह कुछ मन ही मन
कर न सके कोई आकलन,
लगता है कुछ रिक्त-सा
किस हेतु हो यह जतन?
चल, कुछ नया करते हैं
ज़िंदगी के पन्ने पुनः पढ़ते हैं,
जो कुछ रह गया अधूरा
अब उसे पूरा करते हैं।
अधूरी-सी ज़िंदगी में
आशाओं के रंग भरते हैं,
चल ऐ ज़िंदगी,
अब कुछ नया करते हैं।
-सविता सिंह ‘मीरा’,जमशेदपुर
