मैं शून्य पर खड़ी थी
अहसास गहरे थे
पर जमीन अपनी न थी
कहने को तो सब अपने
पर कोई अपना न था
शून्य से शुरू की जिंदगी
कुछ खोने को न था
कदम बढ़ाती गई
दोस्त मिलते गए
कारवां बढ़ता गया
कुछ पता ही नहीं चला
कैसे लेखनी ने साथ निभाया
परायों को भी अपना बनाया
देखती हूं जब पीछे मुड़कर
तो मैने कुछ खोया नहीं
बस भरपूर स्नेह पाया
सीखे जिंदगी के नए मायने
काग़ज़ कलम से गहरा नाता पाया
आज शून्य के साथ
जुड़ गया कुछ ओर भी
आज शून्य से कुछ अधिक हो गई
-डॉ रेखा मित्तल, चण्डीगढ़
