vivratidarpan.com – इतिहास साक्षी है कि 1947 में देश का आधा अधूरा बँटवारा धार्मिक आधार पर हुआ, फिर भी दोनों देशों में दोनों ही धर्मों के कुछ अनुयायी शेष रह गए। पाकिस्तान में अनेक जातियों के हिंदू रह गए और भारत में एक बड़ा मुस्लिम समाज रह गया। प्रारम्भिक काल में सामाजिक और धार्मिक समरसता के लिए साझा संस्कृति का भरपूर प्रचार प्रसार किया गया। स्वाधीनता की आधी सदी के बाद अखंड भारत के देशों भारत, पाकिस्तान और भारत में लोकतांत्रिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट हो जाएगा, कि अन्य देशों के मुक़ाबले भारत में धार्मिक और जातीय आधार पर अधिक स्वतंत्रता है। पाकिस्तान और बंगला देश में हिंदू धर्म से जुड़े अनुयायियों और दलितों की स्थिति किसी से छिपी नही है, किंतु भारत में जातिवादी राजनीति के चलते जिस प्रकार से समाज को दलित, पिछड़ा और सवर्ण को बाँटने के प्रयास किए जा रहे हैं, उससे लगता है, कि राजनीति के हमाम में सभी राजनीतिक दल एक जैसे ही नग्न हैं।
राजनीतिज्ञों को आम आदमी से कोई सरोकार नहीं है। उन्हें केवल अपनी राजनीतिक सत्ता स्थाई रखने के षड्यंत्र रचने हैं। यदि ऐसा न होता तो भारत में सत्ता पक्ष जातीय आधार पर भेदभाव के प्रावधानों को लागू करने का दुस्साहस न करता। जिन शिक्षा संस्थानों का दायित्व देश के प्रतिभावान छात्र छात्राओं की प्रतिभा को विकसित करके उनके कौशल का विकास करना करना है। वे शिक्षा संस्थान भेदभाव और जातीय विघटन का केंद्र बन गए हैं।
अस्पृश्यता एवं छुआछूत का जो अध्याय भारतीय समाज से लुप्त हो चुका है, उस अध्याय को पुराने अप्रामाणिक कुतर्कों से पुनः जीवंत किया जा रहा है। शिक्षा संस्थानों में अब अध्ययन अध्यापन की जगह छात्र संगठन देश की राजनीति में दखल देने लगे हैं। छात्रों को भी जातीय आधार पर बाँटा जा रहा है, जिसका प्रतिकूल असर सामाजिक समरसता पर पड़ रहा है। इस स्थिति का दोषी कौन है ? क्या सत्ता ही अपने भीतर के अंतर्विरोधों से मुक्ति पाने के लिए छात्र छात्राओं को भ्रमित करके अराजकता को बढ़ावा दे रही है या विघटनकारी शक्तियाँ छात्र छात्राओं को उकसा कर राष्ट्र को खंडित करने की दिशा में कार्य कर रही हैं। यह स्पष्ट नहीं है। बड़ा सवाल यही है कि शिक्षा के वातावरण को विषाक्त बनाकर देश को किस ओर ले जाना चाहते हैं ? (विभूति फीचर्स)
