वार्ता पूरबी बयार से – डॉ जयप्रकाश तिवारी

पाकर मुझे नितांत अकेला,

यह कौन, किसने डाला डेरा,

छू-छूकर मेरे तन-बदन को,

गले को अपनी बाहों में घेरा।

 

बयार पूरवी गुदगुदा रही है,

उसको क्या मालूम कि मेरे,

दिल का दर्द वे जगा रही है,

तन मन का ताप बढ़ा रही है।

 

अरे, मेरी बात न पूछो तुम!

हर दर्द यहाँ मेरा सहचर है,

बैठा हूँ चुपचाप, मौन धर,

यहां मौन ही मेरा सहचर है।

 

इसका यह मतलब तो नहीं,

कि अकेला है, घर खाली है,

यहां दीप बहुत,से रखे हुए हैं,

यह प्रतीक्षा रत बनमाली है।

 

मुंह खोला तो छलक पड़ेंगे,

तेरे नयनों से भी खारा-खारा,

गमगीन, उतप्त, गरम आँसू,

रखो संभालकर अपने आंसू।

 

देखो तुम अल्हड़ हो मदमाती,

एक ठंडी पवन का झोंका हो,

इस तरह पास क्यों आ रही?

तूने भी खाया कोई धोखा है?

 

क्या तेरा भी मन भर गया है,

ठंडे-मीठे इस सरिता जल से,

क्यों पीने ये अश्रु यहाँ आई?

नहीं निकला करते यूँ घर से।

 

जा लौट जा वापस घर को तू,

हाँ, लौट जा वापस घर को तू,

यदि देर हुई जग यह टोकेगा,

तुझे घर घुसने से भी रोकेगा।

 

चाहे जितना तू दे ले सफाई,

तेरी बात न कोई समझेगा,

देनी होगी तुझे अग्नि-परीक्षा,

मन निर्मल कोई न समझेगा।

 

घर – घर की यही कहानी है,

कुढ़ता बुढ़ापा और जवानी है,

अपनी अपनी मर्यादा है यहां,

दिख रही आग कहीं पानी है।

 

मेरे कथन से कुछ ना होगा,

अरे, मानेगा यहां कोई नहीं,

निर्जन है, बदन छुया न होगा,

रूप, गंध इसने पिया न होगा।

 

किससे क्या क्या बताओगी?

लौट जा वापस घर को तुम!

करना है समझौता दोनों को,

एक नर हूं मैं, एक नारी तुम!

-डॉ जयप्रकाश तिवारी

लखनऊ, उत्तर प्रदेश

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