वक़्त – रुचि मित्तल

 

कलाई पर नहीं टिकता अब

बस उंगलियों से फिसलता है…

जैसे रेत

कभी

तपती दोपहर-सा चुभता है

तो कभी

कंबल-सा लिपट जाता है

ठंडी रातों में

कभी रुका नहीं

कभी ठहरा नहीं…

बस देखता रहा

हम सबको

बेआवाज़…

मैंने एक बार

उससे पूछा

तू क्यों नहीं थमता

तो मुस्कुरा कर बोला

“तुम ही चलना भूल गए हो।”

कभी बैठो उससे बातें करने

जो गुज़र गया

वो चुप बैठा है

किसी पुराने अलमारी में…

और

जो आने वाला है

वो दरवाज़े की घंटी बजाने ही वाला है।

समय को छूकर देखा है?

वो गर्म नहीं होता

वो गुम होता है।

©रुचि मित्तल, झझर , हरियाणा

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