धुंधली शाम में
आग जलती है चुपचाप।
लकड़ियाँ फटकती हैं
चिंगारियां उड़ती आसमान की ओर।
खेतों से आती फसल की खुशबू
गेहूं के सुनहरे दाने
सरसों के फूलों की पीली चादर।
मिट्टी गुनगुनी हो जाती है
बच्चे नाचते हैं
हाथों में कमंडल लिए।
धुएँ के गुच्छे घुलते हैं रात में
सूरज ढलता है
पर आग बनी रहती है।
नया साल जन्म लेता है
जलती लौ में पंजाब की धरती साँस लेती है
ठंड भागती है दूर।
हर चेहरा चमकता है
उम्मीद की किरणों से।
लोहड़ी आती है हर साल
आग बनकर जलती रहती है।
हमारे भीतर
हमारे खेतों में।
©रुचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा
