लगता हितकारी – अनिरुद्ध कुमार

 

मुक्त हो गये बंधन सारे,

बैठे हर-पल गिनते तारें।

बेगानों की है ये दुनिया,

जीवन से लागें अब हारें।।

 

आज़ाद उड़ें इच्छा जागें,

पिंजड़ा तोड़ें बाहर भागें।

व्याकुलता में रैन गुजारें,

समय दौड़ता आगे आगे।।

 

स्वतंत्र हो रहना हीं अच्छा,

बोल रहा हर बच्चा बच्चा।

जहाँ मन करें आयें जायें,

स्वालंबी जीवन है सच्चा।।

 

स्वछंदता  बड़ीं गुनकारी,

गमकायें मन की फुलवारी।

अपने मन का राजा बनना,

जीवन को लगता हितकारी।।

– अनिरुद्ध कुमार सिंह

धनबाद, झारखंड

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