रेनकोट जैसी फिल्में- ज्योत्स्ना जोशी 

 

vivratidarpan.com – जब मैंने पहली दफ़ा  यह नाम सुना “रेनकोट” तो इस नाम ने मुझे इस क़दर फेसिनेटेड किया मुझे लगा कि फिल्म देखनी चाहिए आखिर रेनकोट के इर्द-गिर्द किस तरह की कहानी बुनी गई होगी।

और जब मैंने यह फिल्म देखी तो क्लाइमेक्स ने सन्न कर दिया आंखें गीली हो गई ।

रेनकोट ऋतुपर्णो घोष द्वारा निर्देशित फिल्म जो 2004 में रिलीज़ हुई,

ऐश्वर्या राय नीरू (नीरूजा) और अजय देवगन मनु (मनोज) अभिनीत इस फिल्म में,सुरेखा सीकरी,अनु कपूर,और मौली गांगुली भी मेहमान भूमिका में हैं।

बरसात की एक दोपहर,पूर्व शादी शुदा प्रेमिका का घर और उससे बरसों बाद मिलने जाता उसका बेरोजगार प्रेमी

पूरी कहानी इस एक कमरे के भीतर जीवन के उतार चढ़ाव की झूठी सच्ची बातें और दोनों कलाकारों के मध्य की जादुई डायलॉग डिलीवरी पर केंद्रित है।

ऋतुपर्णो घोष कितने बड़े निर्देशक हैं  यह उन्होंने अपनी इस फिल्म में यह दिखा कर साबित कर दिया  कि नाही किसी दृश्य को अश्लीन बनाया जाएगा , नाही कोई वल्गैरिटी होगी, किसी भी आलतू-फालतू उछल कूद किए बिना, दर्शकों के सामने एक शुद्ध पवित्र प्रेम कहानी प्रस्तुत की जाएगी

और स्क्रिप्ट इस क़दर प्रबल है कि उसको इस ताम-झाम की कोई जरूरत ही नहीं।

फ़िल्म का फिल्मांकन बंगाली कल्चर को केंद्र में रखकर कलकत्ता शहर में किया गया है जिससे एक भीनी भीनी महक बंगाल की गरिमामय संस्कृति की आती है।

ऐश्वर्या राय निःसंदेह खूबसूरती के सारे प्रतिमानों को पीछे छोड़ती है  लेकिन जितनी खूबसूरत मुझे वो इस  फिल्म में लगी उतनी और कहीं नहीं लगी ,

सादी साड़ी को बंगाली तरीके से पहने हुए और भोली चंचल गांव की लड़की जो शहर में तो आ गई लेकिन उसके अंदर उसका अलहदा अल्हड़ बागपन अभी जिंदा है। वहीं दूसरी ओर अजय देवगन ने अपने संजीदा अभिनय से सम्मोहित कर दिया उनके अभिनय की खासियत यह है कि वो बिना कुछ कहे अपनी आंखों से ही पूरा एक्सप्रेशन दे देते हैं।

एक ऐसा अभिनय जिसमें कहानी में ही झूठ को सच बनाने का अभिनय करना है उसे इतनी गहनता और सूक्ष्मता से दोनों कलाकारों ने प्रस्तुत किया है,

कि हम कुछ क्षण सोचने के लिए मजबूर हो जाएंगे कि क्या सच में प्रेम इस समर्पण का नाम है

फ़िल्म का संपादन कहानी को लय देता है तो संवाद एक गहरी कविता की भांति धीरे धीरे अपनी तासीर छोड़ते हैं, बारिश किसी राग की भांति पूरे माहौल में घुलती रहती है  और देवज्योति मिश्रा ने पारंपरिक बंगाली संगीत और शास्त्रीय संगीत से फिल्म के दृश्यों को जीवंत कर दिया।

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में सम्मानित हुई इस फिल्म

में नायक और नायिका जब बरसों बाद मिलते हैं तो वो ख़ुद को एक दूसरे के सामने खुश दिखाने का नक़ाब ओढ़ लेते हैं,

कहानी के अंत तक लगने लगता है कि प्रेमी ने अपनी प्रेमिका के लिए कितना कुछ कर दिया लेकिन लास्ट सीन में जब प्रेमिका का त्याग सामने आता है तो दर्शक चकित हो जाते हैं  और आह के साथ आवाज़ भी निकलती है what a claimax

दरअसल प्रेमिका ऐसी ही होती हैं

और हां उन लोगों को रेनकोट जरूर देखनी चाहिए जिनके लिए प्रेम शारिरिक आकर्षण और देहिक भोग मात्र है,!! नहीं नहीं

प्रेम सब-कुछ देकर कुछ न लेने का नाम है यह भी प्रेम है यह भी सिनेमा है।

इस फिल्म के विषय में जानकारी है कि यह मनोज बसु द्वारा लिखित लघु कथा विरोधिंसा का रुपांतरण है, लेकिन ज्यादा मान्यता द गिफ्ट ऑफ़ द मैगी (ओ.हेनरी द्वारा आधारित कहानी पर है,

इन्टरनेट पर लगभग -2 घंटे की फिल्म उपलब्ध है। इस बरसात से फ़ुर्सत निकाल कर इस अद्भुत प्रेम कहानी “रेनकोट”को जिसमें रेनकोट की भूमिका क्या है? जरूर देखिएगा।

–  ज्योत्सना जोशी ज्योत, देहरादून, उत्तराखंड

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