विकट दौर है , विचलित युवा , राह न सूझे कोई ।
पढ़-पढ़ पोथी , लिखें परीक्षा , जग-जग राते खोई ।
चड्ढा चाटे चाट मलाई , माधो आलू को तरसता ।
फटी चुनरिया धनिया ओढे, हल्कू एडी घिसता ।
भ्रष्टाचार चरम पर फिर भी , रामराज कहे आया ।
जंगल नदियां पहाड़ डकारे ,फिर भी मज़ा न आया ।
मंदिर – मस्जिद में उलझाया , धर्म अफ़ीम चटाई ।
पुश्तें पाट सकें नहीं जिसको , ऐसी खोदी खाई ।
जागो ! होश संभालो ,अब तो ,समझ भी लो सच्चाई ।
आपस में ,लड मर जाए जनता,इसमें इनकी भलाई ।
✍️.. मीनू कौशिक “तेजस्विनी”, दिल्ली
