ये कविता नहीं,
ये वो चीख़ है —
जिसे कोई सुनता ही नहीं।
ये तूफ़ान नहीं,
ये वो आवाज़ है —
जो मज़लूमों के हक़ में उठती है।
ये ख़ामोशी नहीं,
ये आक्रोश है —
जो हर पल भीतर उबलता है।
ये कहावत नहीं,
ये विचार हैं —
जो टकराने को तैयार हैं।
ये पंक्तियाँ नहीं,
ये लहरें हैं —
जो बदलाव की ओर बढ़ रही हैं।
ये शब्द नहीं,
ये विद्रोह है —
एक मरी हुई व्यवस्था के ख़िलाफ़।
ये कविता नहीं,
ये बारूद है —
जो अन्याय की छाती पर फटेगी।
– दीपक राही,
आर एस पुरा सेक्टर,
जम्मू (जे एंड के)
