नभ में मची हलचल,मचल उठे बादल-
दल-बल संग कुपित हुए,बरसे हो पागल,
झमाझम बरसीं आँगन में बूँदें-
शाख़,फूल,पत्तों पर उछलें और कूदें.
थिरक उठा कोने में रक्खा छाता भी-
सरक-सरक कर बन बैठा मस्ताना जी,
झूम उठा बरखा के जल में डूबुक-डूबुक
नाच उठा तन-मन होकर दीवाना जी.
अंबर लहराया आशिक़ हो गया ज़रा-
धरती की भी प्यास बुझी तन-मन निखरा,
प्रियतम ने फिर पास बुलाया गोरी को-
रुठी जां को चूम मनाया भूली नख़रा.
– डा. अंजु लता सिंह गहलौत, नई दिल्ली
