मैं ही पावस बनकर आई – अनुराधा पाण्डेय

 

मैं ही पावस बनकर आई ।

ख्वाबों के मृदु छोर क्षितिज से,

यादों को अँजुरी में भरकर ,

सुधियों के स्यंदन पर चढ़कर,

धवल गिरी से उतर-उतर कर ,

मैं प्रणय सरस सुधि रस लाई ।

मैं ही पावस…….

 

चन्दन के उपवन में घुसकर ,

मधुगंधों में स्वंय लिपटकर ,

बादल के कंधे पर चढ़कर,

मंद मलय के झोंको के संग-

मैं पिय हित उर पाती लाई ।

मैं ही पावस……….

 

चटक रंग से हस्ताक्षर कर,

बादल की कूंची से गिरकर,

कलियों से तरुणाई लेकर,

मृदुल उलाहन की आहट पर-

मैं मौन निमंत्रण ले आई ।

मैं ही पावस………

 

धरणी की अतुलित प्यास देख ,

हत गाँवों का विन्यास देख ।

ले फसलों के हित स्वर्ण किरण,

बनने हित उसकी मैं धड़कन।

चिर प्राण धरा पर मैं लाई ।

मैं ही पावस बनकर आई।

– अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका,नई दिल्ली

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