मैं मजदूर हूं – हरी राम यादव

अलख सुबह निकल पड़ता हूं,

मैं हाथ में लिए एक झोला।

उसमें होती हैं कुछ सूखी रोटियां,

और होता है आलू नमक का घोला ।

 

आस में खड़ा होता हूं काम के,

मजदूरों वाले चौराहे पर शहर के।

तलाश में आते हैं जहां पर लोग,

मोटर कारों पर सज संवर के।

 

होती हैं कुछ मोल-भाव की बातें,

लेने देने वाली मजदूरी की।

कुछ लोग मान जाते एक बार में,

कुछ फायदा उठाते मजबूरी की।

 

दिन भर करता हूं जी तोड़ श्रम,

बहाता हूं सिर से पैर तक पसीना।

फिर शाम को मिलते हैं चार पैसे,

खुश हो जाता हूं जैसे मिला नगीना।

 

न कभी छुट्टी, न कभी त्यौहार,

बस रोज चलता यही व्यवहार।

चाहे हो सिर दर्द या जकड़न,

पेट की आग से जाता हूं हार।

 

बच्चों की भूख प्यास के आगे,

अपनी भूख को जाता हूं भूल।

लड़ता हूं रोज मैं स्वयं से,

हटाने आर्थिक विषमता की धूल।

 

बस जीवन का यही रोज क्रम हैं,

हमारा ईश्वर, हमारा श्रम है।

कहते हैं बदलते हैं हालात,

लगता है यह केवल एक भ्रम है।

– हरी राम यादव, अयोध्या, उत्तर प्रदेश

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