vivratidarpan.com- जयपुर में निवासी इंजीनियर पद से सेवानिवृत्त वरिष्ठ कवि श्रीकांत तैलंग तकनीकी पृष्ठभूमि के बावजूद साहित्य,समाज और संवेदना के क्षेत्र में सक्रिय रहने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं। जीवन के अनुभवों को अपनी दृष्टि से शब्दों में शब्द चित्र खींचना और विभिन्न माध्यमों से आम जन तक पहुंचाना उनकी साहित्यिक यात्रा का सार कहा जा सकता है।
अपने स्व. पिताश्री पंडित रामकृष्ण तैलंग जी स्मृतियों को जीवंत रखने के अकिंचन प्रयास और एक पुत्र की विनम्र श्रद्धांजलि स्वरूप हम सबके बीच ‘मेरी लकीरें मेरी कविताएं’ काव्य संग्रह का आगमन भावुक करता है। तैलंग जी साहित्य और समाज सेवा की प्रेरणा विरासत में मिली है। निश्चित ही पिताजी के शिक्षक, साहित्यिक और सामाजिक यात्रा का प्रभाव उनमें परिलक्षित हो रहा है।
अब इसे माँ शारदे की कृपा कहें या तैलंग जी का चिंतन, सोच, समर्पण, श्रद्धा माने कि उन्होंने ने न केवल अपनी साहित्यिक यात्रा को निरंतर आगे बढ़ाते रहने का प्रयास किया, बल्कि उसे संग्रह रुप में श्रद्धांजलि भी देने का सुंदर प्रयास किया है ।
पांच खंडों से सुसज्जित संग्रह के प्रथम खंड – आराधना में भक्ति और अध्यात्म की महत्ता कवि हृदय को भक्ति, करुणा, प्रेम, त्याग और वैराग्य के भावों से ओतप्रोत आत्मिक अनुभवों के साथ का प्रतिबिम्ब जैसा है। वे मानते हैं कि समाज में भक्ति की शक्ति ही मनुष्य को मानवता से जोड़ने में सक्षम है। प्रस्तुत रचनाओं में शाब्दिक श्रद्धा, सौम्य प्रवाह, ईश्वर के प्रति अटूट आस्था, विश्वास और समर्पण की झलक स्पष्ट होता है। इस खंड को केवल धार्मिक भावनाओं का संकलन नहीं, बल्कि एक मानवीय मूल्यों की स्थापना की एक कलमकार की कोशिश जैसी है।
द्वितीय खंड – राम लला विराजमान में कवि ने भगवान श्रीराम के जीवन दर्शन को अपनी काव्य प्रस्तुति के माध्यम से जीवंत ही नहीं भावित्मक चित्रण प्रस्तुत करते हुए सरल, सहज और मोहक रूप में शब्दांकित किया है।
संग्रह के तृतीय खंड – सुगंध में जीवन की विविधताओं को अपने शब्द भाव के माध्यम से प्रस्तुत किया है ।
विविध शीर्षक और विषय के साथ कवि की सामाजिक चेतना और समय की नब्ज़ पर पकड़ सकारात्मक नजरिया, संवेदना , चिंतन और प्रेरक भाव पाठक को अपने आसपास के जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने, महसूस करने को प्रेरित करने का दायित्व पूर्ण प्रयास है। इस खंड की रचनाओं में कवि के सामाजिक और व्यावहारिक दृष्टि की गहनता का प्रभाव महसूस किया जा सकता है।
चतुर्थ खंड – सम्मान में कवि ने राष्ट्र, भाषा, तिरंगा और वीरता के प्रति अपनी निष्ठा उकेरने के साथ ही योगी जी, मोदी जी और महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू जी के प्रति प्रेरक आदरभाव प्रस्तुत किया है।जो कुछ लोगों को नागवार भी लग सकता है। फिर भी राष्ट्रगौरव और कर्तव्य भावना को जागृत करने की दिशा में इस खंड की अपनी महत्ता को नकारना आसान नहीं है।
अंत में पंचम खंड में प्रेरणा के स्रोत- फूल तुम क्या हो, प्रेरणा के स्त्रोत? संवेदनशील और भावुकता के साथ सीधे संवाद करती प्रतीत होती है। जबकि कवि हो रहे हैं
-कवि होने की आत्मस्वीकार्यता की अनुभूति कराता है— जहाँ वे बताते हैं कि सृजन ही उनकी जीवन-रेखा है, और कविताएँ ही अपनी लकीर स्वीकार करते हैं।
इस भाग में पुस्तक प्रेरणा, संदेश, मेरे बाबू जी, आत्यकथ्य, सम्मान प्रथम खंड से पूर्व समायोजित किया जाना चाहिए था।
तैलंग जी की भाषा सरल, सहज और भावनात्मक
हृदय से निकलती महसूस कराती हं।शब्दों में प्रवाह, भावों में गहराई, और अभिव्यक्ति में आत्मीयता के साथ यत्र-तत्र लोकभाषा का प्रयोग कविताओं को जीवंत बनाती है।
मेरा मानना है कि विस्तार पब्लिकेशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित, मात्र ₹199/- मूल्य वाली ‘मेरी लकीरें मेरी कविताएँ’ काव्य संग्रह होने के साथ जीवन की भावनात्मकता के स्वरूप का छोटा किंतु महत्वपूर्ण दस्तावेज जैसा है।क्योंकि संग्रह न केवल काव्य प्रेमियों बल्कि युवाओं और नवांकुर कवियों के लिए किसी आइने का बोध कराने में समर्थ है। जिसमें हर किसी के लिए कुछ न कुछ ग्रहणीय तो है, जरुरत है उस संजोने की।
अंत में प्रस्तुत संग्रह के लिए श्रीकांत तैलंग जी को असीम बधाईयाँ शुभकामनाएं, आप स्वस्थ सानंद रहें और अपनी साहित्यिक सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए साहित्य समाज को पुष्पित, पल्लवित करते रहें।
समीक्षक – सुधीर श्रीवास्तव गोण्डा, उत्तर प्रदेश 8115285921
