यह हिंदूं नव वर्ष नहीं है।
पर मन में कम हर्ष नहीं है।
हम तो उत्सव प्रेमी ठहरे।
खुश होने में हर्ज नहीं है।।
नव संवत्सर जब आयेगा।
नई बहारें सँग लायेगा।।
मिलजुल सब बाँटेंगे खुशियाँ। ।
हर्ष दोगुना हो जायेगा। ।
नई बहारें सँग आयेगी
धरा पुष्प से खिल जायेगी
वासंती उत्सव तब होगा।
घर-घर खुशहाली छायेगी।।
अब भी खुशी मनाओ प्यारे।
रंग सजे हैं न्यारे-न्यारे।
खुशियाँ जब मुस्काती आयें।
गले लगाओ मिल कर सारे।।
जीवन हर पल रीत रहा है।
हर पल क्रमशः बीत रहा है।
लें बटोर हर क्षण खुशियों के।
समय प्रेम का जीत रहा है।।
– डॉ क्षमा कौशिक,
देहरादून, उत्तराखंड
