दुनिया की भीड़ में कहीं खोई हुई हूँ मैं,
मुद्दत हुई अकेले में खुद से नहीं मिली।
हो ही न जाए आप पर इसका असर हुज़ूर,
कैसे दिखाऊँ आप को जख़्में-जिगर हुज़ूर।
जिससे तमाम उम्र मुहब्बत न हो सकी,
फिर भी मैं उसके साथ हूँ परछाई की तरह।
तब तक तो ठीक ठाक था सब कुछ यहाँ मगर,
जब से सवारा और भी उलझी है रहगुज़र।
तसव्वुर में तेरा चेहरा मेरे अब क्यों नहीं आता
सनम रूठे हो मुझसे मगर इतना सताओ ना।
– रुचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा
