मेरी कलम से  – रुचि मित्तल

भरोसा ही नहीं मुझको ज़माने के खुदाओं पे,

जहां में फ़ितरते इंसा सभी की एक जैसी है।

 

बड़ी खामोश गुमसुम हैं अभी सागर की ये लहरें,

नदी लगता है इससे, बेवफाई कर गयी कोई ।

 

मेरा दिल तोड़ के खुश हो बहुत अच्छा बहुत अच्छा,

तुझे  खुश  देख  कर  मेरा  भी  मन  शादाब  रहता  है।

 

चट्टानों  सा सख्त कहीं  तो  कहीं  है धारा नीर की,

पुरुष कहीं है फूल के जैसा कहीं धार शमशीर की।

 

मुहब्बत की कसम खाकर भी मुझसे झूठ बोले तुम,

अगर कुछ भी नहीं था तो तुम्हारी आँख क्यों बरसी।

– रुचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा

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