उदासी क्यूँ अरे मन देख, पतझर बीत जायेगा।
लिए झोली भरी रँग की, पुनः मधुमास आयेगा।।
गिरेंगी पत्तियाँ सूखी, नवल तरु को सजायेंगी।
नया धर रूप शाखों पर, कली फिर मुस्कुरायेंगी।।
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भगवा धारण कर लिया, नहीं संत व्यवहार।
ऐसे साधु संत से, नहीं जगत उद्धार।।
नहीं जगत उद्धार, त्याग की देते शिक्षा।
स्वयं रहे सुख भोग, नहीं मानें धन भिक्षा।।
कहे क्षमा सुन मीत, चाहते बनना अगवा। ।
शुद्ध नहीं व्यवहार, वेश धरते हैं भगवा।।
-डॉ क्षमा कौशिक, देहरादून, उत्तराखंड
