उलझन में इश्क <>
तेरी खामोशी मोहब्बत में दिल बगावत करने लगा है।
निगाहे मुझसे चुराना चाहत में रुकावट करने लगा है।
कभी हां कभी ना उलझन में पड़े हो यार कैसा प्यार।
सच्चा मेरा दिल हा ना इश्क में मिलावट करने लगा ह
इशारा इश्क का <>
कभी बेवजह वो पास मेरे भूल के आता नहीं है।
खुद वो पास अपने बिना काम मुझे बुलाता नहीं है।
इश्क में पास आना वक्त की पाबंदी जरूरी है क्या।
जब दिल किया मिलने इशारा समझ पाता नहीं है।
घर है कोई मजाक नहीं <>
घर के लोग घर तोड़ने की बात करने लगे कोई मजाक है क्या?
बार बार सभी उकसावे की बात करने लगे कोई मजाक है क्या?
जब घर ही न रहेगा तू रहेगा न हम या कोई और भी रहेगा यहां।
बहकाने से परिवार टूट कर बिखरने लगे कोई मजाक है क्या?
– श्याम कुंवर भारती (राजभर), बोकारो, झारखंड
