परवाह मेरी<>
मैने दिल लगाया भी किससे जिसे प्यार की परवाह ही नहीं।
चाहा कितना उसे जान से ज्यादा जिसे मेरी कोई चाह ही नहीं।
दर्द ही दिया तड़पाया और मुझे भरमाया फिर भी चाहा उसे।
पत्थर दिल ने किया घायल मगर मुंह से निकली आह ही नहीं।
दिल की राहें।<>
तेरी हर नादानियों और ज्यादतियों को मैने माफ किया।
मगर मुझ दिल-ए-नादान का नहीं कोई तूने इंसाफ किया।
दौड़ती भागती दुनिया संग भागे जा रहे हो न जाने कहा।
मेरे करीब आओ दिल-ए-राहों को तुमने नहीं साफ किया।
श्याम कुंवर भारती (राजभर), बोकारो, झारखण्ड
