महके हैं फूल, चली महकी बहारें – गुरुदीन वर्मा

महके हैं फूल, चली महकी बहारें।

निकला है चांद, चमके नभ में सितारें।।

छाई है मस्ती, झूमे मस्ती में सारे। गाये तराने।।

महके हैं फूल————————–।।

 

दुल्हन बनी है यह धरती हमारी।

माथे पे चमके इसके बिंदिया प्यारी।।

प्राणों से हमको प्यारी, यह शान हमारी।

देती हैं खुशियाँ, लेकर दुःख हमारे।। बड़ा अहसान है।।

महके हैं फूल————————–।।

 

घर-घर जले हैं दीपक, जैसे हो दीवाली।

बिखरे हैं रंग कई, बनकर रंगोली।।

फसलें लहराई है, हरियाली छाई है।

कोई नहीं है दुःखी, खुश है चेहरे सारे। हरदिल आबाद है।।

महके हैं फूल————————–।।

 

दरख़्त पे बैठे पँछी, राग सुनाये।

सागर में उठती लहरें, उमंग जगाये।।

इठलाती झूमे कलियां, दिलों की महके बगियां।

नभ में छाए बदरा, छोड़े फुहारें। हसीन नजारा है।।

महके हैं फूल————————–।।

– गुरुदीन वर्मा आज़ाद

तहसील एवं जिला-बारां (राजस्थान)

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