मध्यप्रदेश की पुरातात्विक संपदा (पुस्तक चर्चा) – विवेक रंजन श्रीवास्तव

vivratidarpan.com – भारत की पुरातात्विक विरासत विश्व के सबसे समृद्ध सांस्कृतिक खजानों में से एक है। मोहनजोदड़ो से लेकर खजुराहो, नालंदा से लेकर हम्पी तक, ये स्थल न केवल हमारे गौरवशाली अतीत के प्रतीक हैं, बल्कि इतिहास , वर्तमान और भविष्य के लिए शिक्षा, पर्यटन और राष्ट्रीय पहचान का आधार भी हैं। इन स्थलों की वर्तमान दशा चिंताजनक है। अतिक्रमण, पर्यावरणीय क्षति, उपेक्षा और अज्ञानता के कारण यह विरासत धीरे-धीरे नष्ट हो रही है।
देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का हृदयस्थल मध्यप्रदेश, अपने अनेकानेक रहस्यों, कलात्मक विरासत और प्राचीन गौरव को समेटे हुए है। यह पुस्तक, “मध्यप्रदेश की पुरातात्विक सम्पदा”, इसी धरोहर को उजागर करने का एक विनम्र प्रयास है। यह न केवल इतिहास के प्रति जिज्ञासा रखने वाले युवाओं, बल्कि पर्यटकों, शोधार्थियों और सांस्कृतिक विरासत के प्रेमियों के लिए एक मार्गदर्शिका के रूप में सहज भाषा में जिलेवार विवरण के साथ सचित्र तैयार की गई है।
पुस्तक का प्रारंभ यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों के साथ होता है, जिनमें मध्यप्रदेश के विश्व प्रसिद्ध अद्वितीय स्थलों का परिचय पाठकों को मिलता है। खजुराहो के मंदिरों में उकेरी नृत्य-संगीत और दार्शनिक मूर्तियाँ, साँची का बौद्ध स्तूप जो शांति और स्थापत्य का प्रतीक है, और भीमबेटका की गुफाएँ जो मानव सभ्यता के प्रारंभिक चित्रों को समेटे हुए हैं। ये सभी स्थल मध्यप्रदेश को वैश्विक पहचान देते हैं। इनके माध्यम से पाठक प्राचीन भारत की बौद्धिक और कलात्मक उत्कृष्टता को समझ सकेंगे।
हमारे लिये गौरव की बात है कि न केवल पुरातात्विक धरोहरें वरन हमारे पुराने ग्रंथ भी वैश्विक महत्व के हैं । हाल ही में श्रीमद्भगवद्गीता और भरत मुनि के नाट्यशास्त्र को यूनेस्को के मेमोरी ऑफ़ द वर्ल्ड रजिस्टर में शामिल किया गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त की है। यह रजिस्टर महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों को संरक्षित करता है और उनकी पहुंच को वैश्विक रूप से सरल बनाता है। भारत के चौदह अभिलेख इस रजिस्टर में शामिल किये गये हैं ।
प्रस्तुत पुस्तक का मुख्य कलेवर मध्यप्रदेश के 52 जिलों की पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक विरासत का विस्तृत विवरण है। जिलेवार धरोहरों का परिचय पाठक को मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक यात्रा करवाता है । ग्वालियर का किला, जो इतिहास की वीरगाथा सुनाता है। माण्डू का जहाज महल और होशंग शाह का मकबरा, इंडो-इस्लामिक वास्तुकला के अनूठे उदाहरण हैं। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर की आध्यात्मिक महत्ता और ओरछा की राजपूत शैली में बनी इमारतें,ये सभी इस पुस्तक में सचित्र रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। प्रत्येक जिले की विशेषताओं को तस्वीरों और सरल भाषा में लिखे गए विवरणों के साथ समझाया गया है, जिससे युवा पाठकों के लिए जानकारी सुलभ और रोचक बन सके।
यह पुस्तक विशेष रूप से युवा पीढ़ी को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। डिजिटल युग में जहाँ ऐतिहासिक विरासत से सीधा जुड़ाव कम हो रहा है, वहाँ यह पुस्तक चित्रों और रोचक तथ्यों के माध्यम से इतिहास को जीवंत बनाती है। छात्रों के लिए यह एक शैक्षिक संसाधन है । यात्रा प्रेमियों के लिए एक गाइड की भूमिका भी निभाती है । यह पुस्तक युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ते हुए विरासत के संरक्षण की प्रेरणा देती है।
पुस्तक का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि पाठकों को विरासत के प्रति जागरूक करना भी है। जानकारियां तो इन दिनों गूगल पर एक क्लिक में हर मोबाईल पर सुलभ हैं किन्तु इससे किताबों के त्वरित संदर्भ का महत्व कम नहीं हुआ है । मध्यप्रदेश की प्राचीन इमारतें, कलाकृतियाँ और सांस्कृतिक परंपराएँ हमें बताती हैं कि हमारा अतीत कितना समृद्ध था। इसे बचाने की जिम्मेदारी आज की युवा पीढ़ी पर है। पुस्तक के अंत में दिए गए “विरासत संरक्षण” अध्याय में सरल उपाय बताए गए हैं, जिनसे युवा अपने स्तर पर योगदान दे सकते हैं।
“मध्यप्रदेश की पुरातात्विक सम्पदा” पुस्तक एक ज्ञान सेतु है, जो पाठकों को अतीत और वर्तमान से जोड़ती है। यह न केवल ज्ञान का भंडार है, बल्कि एक आह्वान भी है कि हम अपनी धरोहर को पहचानें, उसका सम्मान करें और उसे भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखें। आशा है, यह पुस्तक पाठकों के मन में मध्यप्रदेश की महान विरासत के प्रति प्रेम और जिज्ञासा का बीज बोएगी। जब हम पुरातात्विक धरोहर की बातें करते हैं तो स्वतः ही संग्रहालयों का महत्व स्पष्ट हो जाता है , अतः प्रदेश के प्रमुख संग्रहालयों विषयक जानकारियां भी संदर्भ के लिये दी गई है ।
” मध्यप्रदेश की पुरातात्विक सम्पदा ” में यत्र तत्र बिखरी हुई विषय संबंधित सामग्री को सिलसिले से संकलित किया गया है। आशा है यह किताब नई पीढ़ी, पर्यटन तथा कंपीटीटिव परीक्षा की तैयारी के लिये बहुउपयोगी होगी ।
पुस्तक के लेखक विवेक रंजन श्रीवास्तव जिला पुरातत्व संघ के सदस्य भी रह चुके हैं।
सार रुप में कहें तो पुरातात्विक विरासत का संरक्षण केवल सरकार या विशेषज्ञों का नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग का दायित्व है। युवाओं की ऊर्जा, सरकार की नीतियाँ, स्थानीय प्रशासन की कार्यवाही और जनता की जागरूकता,इन सभी के समन्वय से ही हम अपने इतिहास को भविष्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। हमारी सभ्यता की परीक्षा इस बात में है कि हम अपने इतिहास को कितना सम्मान देते हैं। (विभूति फीचर्स)

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