मतलबी यार किसके,खाया-पिया खिसके (व्यंग्य) – सुधाकर आशावादी

vivratidarpan.com – बरसों पहले रजत पट पर एक फ़िल्म आई थी – दुश्मन। जिसमें एक गीत था – दुश्मन दुश्मन जो दोस्तों से भी प्यारा है। ऐसे ही दोस्तों के प्रसंग अनेक फ़िल्मों में दर्शाए गए, जिनमें दोस्ती को सर्वोपरि बताया गया। मित्रता के क़िस्सों में भगवान श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की मिसाल आज भी दी जाती है। मित्रता में इतना खुलापन तो होता ही है, कि जो बात अपने परिवार में किसी से नही बताई जा सकती, वही बात मित्रों से छिपाई नही जाती।
इतिहास साक्षी है, कि जब अपने रक्त सम्बन्धी भी साथ छोड़ देते हैं, तब सच्चा मित्र काम आता है। बहरहाल मित्रता की परिभाषा यही है तथा मित्र की पहचान संकट के समय ही होती है। युग बदल रहा है। मित्र भी स्वार्थी हो गए हैं। मित्रों के बारे में कुछ नई परिभाषाएँ भी गढ़ दी गई हैं मसलन मतलबी यार किसके, खाया पीया खिसके। अपना स्वार्थ सिद्ध होते ही मतलबी मित्र पहचानना बंद कर देते हैं। यदि संयोग से मित्र समृद्धि शाली हो तथा प्रगति की निरंतर सीढ़ियाँ चढ़ रहा हो, तब भी सबसे अधिक ईर्ष्या मित्र को ही होती है। कारण स्पष्ट है कि मित्र हो या शत्रु, कोई अपने दुःख से दुखी नही होता, वह अपने आसपास के मित्रों, संबंधियों के सुख से दुखी होता है। यूँ तो यह सामाजिक स्थिति है, किंतु अब यह स्थिति विस्तार पा चुकी है। इसका विस्तार देश की सीमाओं को लांघकर समूचे विश्व में हो चुका है। अपने एक मित्र हैं, जिनकी समृद्धि के लिए हमने अभियान चलाया, उसे उच्च शिखर तक पहुँचाने में सहयोग दिया। उसके विजयी होने की कामना की, उसे राजा बनाया। राजा भी ऐसा जैसे कि चक्रवर्ती सम्राट। हमने विचारा था, कि चक्रवर्ती सम्राट अपना मित्र है, तो मुसीबत में हमारे साथ खड़ा होगा। उसकी आँखों में शर्म हया होगी, वह हमारा सम्मान करेगा। हमारे कहने से कुछ विशेष सुविधाएँ देगा। सहयोग और मित्रता के लिए हमारा आभार व्यक्त करेगा। हमारा एहसान मानेगा, किंतु ऐसा नही हुआ, मित्र भी मुफ़्तख़ोरों की तरह एहसान फ़रामोश निकला। जिस प्रकार से बरसों से मुफ़्तख़ोरों को मुफ़्त में राशन पानी देने के बाद भी वफ़ादारी की उम्मीद नही की जा सकती। उसी प्रकार मित्र ने भी वफ़ादारी जैसा शब्द अपने शब्द कोश से हटा दिया। वह हमारी समृद्धि और विशेष योग्यता से ऐसा चिढ़ा, कि उसने हमारे ही पर कतरने की तैयारी कर ली। हिंदी चीनी भाई भाई की तर्ज़ पर अपना मित्र भी कहता रहा और हमारी आस्तीनों ने डंक मारने का प्रयास भी करता रहा। जितना भी उसे समझाते कि मित्र के साथ मित्रता पूर्ण व्यवहार करो, उतना ही उसकी सनक बढ़ती जाती। शनैः शनैः उसका व्यवहार शत्रु से भी अधिक शत्रुता पूर्ण होने लगा। कहने को खुद को मित्र सिद्ध करने में वह पीछे नही है, बार बार हमारी प्रशंसा करता है, हमें अपना मित्र घोषित करता है, मगर हरकतें शत्रु सरीखी करता है। लगता है कि यदि कोई मित्र ऐसा व्यवहार करे, तो किसी को शत्रु की आवश्यकता ही न रहे। मित्र के इस आचरण से एक लाभ तो हुआ कि आस्तीनों में छिपे साँपों की पहचान हो गई । जिन्हें हम अपना और अपने परिवार का सगा समझते रहे, उनकी कलई खुल गई। वे खुलकर अपना ज़हर उगलने लगे। जैसे आस्तीन में छिपे वे लोग मित्र के व्यवहार में शत्रुतापूर्ण परिवर्तन होने की प्रतीक्षा कर रहे हों। ख़ैर जो भी हो। इतना अवश्य है कि यदि हम सुदृढ़ हैं, शक्तिमान हैं, समर्थ हैं, तो चाहे कितने ही सनकी मित्र अपने कलुषित आचरण से शत्रुता निभाएँ, तब भी कोई हमारा बाल तक बाँका नही कर सकता। (विनायक फीचर्स)

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