खुद्दारी का मैं आराधक,श्रम की पूजा करता हूँ ।
समझौतों को मित्र बनाकर, जीवन पथ पर चलता हूँ।
मजदूरी के द्वारा अपना,करूँ गुजारा जीवन भर।
दृष्टि न डालें लक्ष्मी मैया, कभी हमारे आँगन पर।
कृपा करो माँ मेहनतकश पर, विनती करता रहता हूँ ……।
स्वाभिमान, ईमान हमारे, मन आँगन को महकाते।
मेल-जोल को मीत बना हम, निज अधिकारों को पाते।
लगन, परिश्रम के आँचल को, सदा पकड़ कर रखता हूँ…..।
जोश अपरिमित,फौलादी तन, सीमित आमदनी अपनी।
सहनशक्ति संतोष बढ़ाती, बन जाती सुख की जननी।
आतप की परवाह न करता, श्रम जल से मिल हँसता हूँ….।
— मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश
