मकर संक्रांति : उत्तराखंड में घुघुती – कविता बिष्ट

vivratidarpan.com Dehradun – ईश्वर करे यह पावन पर्व आपके जीवन को उत्साह, उल्लास और खुशियों से भर दे।
सूर्य के उत्तरायण होने के इस शुभ अवसर पर जीवन में नव ऊर्जा, नई आशाएँ और सकारात्मकता का संचार हो,और मकर संक्रांति आप सभी के जीवन में स्वास्थ्य, समृद्धि, सुख-शांति और प्रेम के मधुर रंग भर दे।
भारतवर्ष में मकर संक्रांति हर प्रांत में हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। इसे मनाने के तरीके भले ही अलग-अलग हों, पर प्रत्येक प्रदेश की खान-पान परंपराएँ, वेश-भूषा, संस्कृति, जलवायु और रीति-रिवाज उस क्षेत्र की समृद्ध लोकपरंपरा को जीवंत कर देते हैं। अंततः हर पर्व का एक ही उद्देश्य होता है घर-आँगन में खुशी और उल्लास को आमंत्रित करना।
उत्तराखंड कुमाऊँ क्षेत्र में मकर संक्रांति घुघुती के नाम से प्रसिद्ध है। सूर्य के उत्तरायण होने का यह पावन पर्व केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि आशा, प्रकाश और नई ऊर्जा का उत्सव है। यहाँ यह दिन घुघुती, लोकगीतों, कौवों को आमंत्रण और पारंपरिक मेलों के साथ विशेष उल्लास से मनाया जाता है। गुड़-घी की मिठास, बचपन की स्मृतियाँ और घर-आँगन में फैलती आत्मीय खुशी मकर संक्रांति हर हृदय में नव उल्लास भर देती है।
मकर संक्रांति के आते ही गाँव की सुबह कुछ अलग ही रंग लेकर आती थी।बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं प्रातः उठकर नहा-धोकर पूजा करना और रसोई में फैलती गुड़-घी की सौंधी खुशबू मन को पुलकित कर देती थी। आटे, गुड़ और घी से बनी घुघुतियाँ जब चिड़िया, मछली, डमरू या ढाल के आकार में तली जातीं, तो मानो रसोई में ही पर्व उतर आता।
उत्तराखंड की संस्कृति में घुघुती केवल एक पकवान नहीं, बल्कि बचपन की मीठी स्मृतियों और लोकआस्था का जीवंत उत्सव है। घुघुती की माला पिरोना अपने आप में एक अनोखा खेल होता था। धागे में घुघुती के साथ संतरे या अन्य फल सजते और बच्चों के गले में वह माला किसी हार से कम नहीं लगती।
अगली सुबह छत पर जाकर कौवों को बुलाने का इंतज़ार सबसे रोचक क्षण होता है।
“काले कौवा काले, घुघुती माला खाले”
कौवा जैसे ही पास आता, मन खुशी से झूम उठता। ऐसी मान्यता है कि कौवों को घुघुती खिलाने से पितृ प्रसन्न होते हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है इस विश्वास में गहरी आत्मीयता और संस्कार निहित हैं।
सूर्य के उत्तरायण होने का यह पर्व केवल एक खगोलीय घटना नहीं, बल्कि लोकजीवन का उल्लासपूर्ण उत्सव भी है। गीत-संगीत, मेलजोल और परंपराएँ इसे और अधिक भव्य बना देती हैं। आज भी जब घुघुती का नाम आता है, तो गाँव की वही सर्द सुबह, छत पर बुलाते कौवे और बचपन की निश्छल मुस्कान आँखों के सामने उतर आती है यही तो है घुघुती, स्मृतियों का स्वाद।
— कविता बिष्ट ‘नेह’अध्यक्ष: जीवन्ती देवभूमि

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