भ्रष्टाचार जनित अराजकता और स्वाधीन भारत – डॉ. सुधाकर आशावादी

vivratidarpan.com – आज देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के अवरोधक बिंदुओं पर चर्चा करना समय की माँग है, क्योंकि जिस प्रकार से अराजक गतिविधियों के माध्यम से गतिशील भारत की प्रगति का मार्ग अवरुद्ध करने के षड्यंत्र चल रहे हैं। उससे लगता है कि अराजकता उत्पन्न करने के ज़मीनी कारणों की पड़ताल की जाए। मेरे विचार से स्वाधीन भारत में न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका में व्याप्त भ्रष्टाचार चिंता का विषय है। जिन पर राष्ट्र को दिशा प्रदान करने तथा ईमानदारी से देश की व्यवस्था को संचालित करने का दायित्व है, वही अपने दायित्व का निर्वहन करने में अक्षम प्रतीत हो रहे हैं। यदि ऐसा न होता तो व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाकर अराजक तत्व देश की आंतरिक व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए एड़ी चोटी का जोर न लगाते। देश का दुर्भाग्य यही है कि लंबित न्याय और कार्यपालिका की हठधर्मी के चलते आम आदमी के लिए लागू की जाने वाली व्यवस्था में पग पग पर अवरोध उत्पन्न किए जाते हैं, जिस कारण सत्ता की छवि बिगड़ती ही है।
यदि देश में भ्रष्टाचार की स्थिति का अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट होगा कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टोलरेंस की नीति अपनाने वाले कठोर नायक भी कार्यपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार रोकने में असमर्थ सिद्ध हो रहे हैं। भ्रष्टाचार में होने वाली निरंतर बढ़ोतरी के लिए व्यवस्था में लगे दायित्ववान सभी घटक उत्तरदायी हैं। भ्रष्टाचार को संरक्षण देने में पक्ष विपक्ष से जुड़े जनप्रतिनिधि और उनके कारिंदों की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। भले ही विश्व स्तर पर भारत अपने ज्ञान व कौशल से विश्व गुरु बनने की दिशा में अग्रसर हो, लेकिन अपनी ही आंतरिक व्यवस्था को दुरुस्त न करने के कारण अराजक तत्वों के षड्यंत्रों से जूझने हेतु विवश है।
ऐसे में अपेक्षा की जानी चाहिए कि भारत की स्वाधीनता एवं स्वस्थ लोकतंत्र को बचाने के लिए गंभीरता से किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार को ध्वस्त करने के भागीरथी प्रयास किए जाएँ तथा देश में भ्रष्टाचार से जनित अराजकता पर कड़ा अंकुश लगे और देश को भ्रष्टाचार जनित अराजकता से मुक्ति मिल सके। (विनायक फीचर्स)

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