भगोरिया: आदिवासी संस्कृति का जीवंत उत्सव – प्रवीण कक्कड़

vivratidarpan.com – संस्कृति वो जड़ है जो हमें तूफानों में भी खड़ा रखती है, और उत्सव वो टहनी है जिस पर खुशियों के फूल खिलते हैं। ​फाल्गुन की हवाओं में जब पलाश के सुर्ख फूलों की मादक गंध घुलने लगती है और खेतों में गेहूँ की बालियाँ सुनहरी होकर झूमने लगती हैं, तब आदिवासी क्षेत्रों की पहाड़ियों में एक अलग ही संगीत गूँजने लगता है। यह संगीत है भगोरिया का। भगोरिया केवल एक लोक-उत्सव नहीं है, यह मालवा और निमाड़ के आदिवासी समाज के स्वाभिमान, उनकी सादगी और प्रकृति के प्रति उनके अगाध प्रेम का जीवंत घोषणापत्र है। यह उत्सव बताता है कि दुनिया चाहे कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, अपनी जड़ों की ओर लौटने का आनंद ही कुछ और है।
आज के दौर में जब हम भगोरिया को देखते हैं, तो एक तरफ पारंपरिक मांदल की थाप है और दूसरी तरफ आधुनिकता का शोर। करीब चार दशक पहले मेरी पुलिस विभाग की पहली पोस्टिंग यहीं हुई थी, तब से अब तक परिदृश्य बहुत बदला है। जहाँ कभी प्रकृति की प्रधानता होती थी, वहाँ अब बाजारवाद का रंग भी चढ़ने लगा है। मेलों में अब केवल ढोल-ताशे नहीं, बल्कि लाउडस्पीकरों पर बजते फिल्मी गीत और ब्रांडेड कपड़ों की चमक भी दिखाई देती है।
​लेकिन, इस बदलाव के बीच सबसे सुखद पहलू यह है कि इस अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने का बीड़ा खुद आदिवासी समाज ने उठाया है। युवाओं के हाथों में आज स्मार्टफोन भले ही हों, लेकिन उनके पैरों में थिरकन आज भी उसी ‘मांदल’ की लय पर आती है जो उनके पूर्वजों की थी। यह उनकी अपनी पहचान को बचाए रखने की एक मौन लेकिन सशक्त क्रांति है।
​मेरी स्मृतियाँ मुझे करीब चार दशक पीछे ले जाती हैं। पुलिस सेवा में प्रवेश के ठीक बाद मेरी पहली पोस्टिंग आदिवासी अंचल झाबुआ में हुई थी। वह एक ऐसा दौर था जब प्रशासनिक जिम्मेदारियों की तुलना में मुझे इस अंचल की जीवन-शैली को समझना ज्यादा चुनौतीपूर्ण और रोमांचक लगा। खाकी वर्दी पहनकर जब मैं पहली बार भगोरिया की व्यवस्था संभालने पहुँचा, तो मैं दंग रह गया। वहाँ कानून नहीं, बल्कि लोक-परंपरा का अनुशासन था। वह जीवंतता, वह निश्छल मुस्कान और सांस्कृतिक गरिमा आज भी मेरी आँखों में उतनी ही ताज़ा है, जितनी उस समय थी।
भगोरिया का आयोजन होली से ठीक सात दिन पहले शुरू होता है। यह वह समय है जब रबी की फसल कटकर घर आ चुकी होती है और किसान के पास अपनी मेहनत का जश्न मनाने का वक्त होता है। साप्ताहिक हाटों के रूप में लगने वाले ये मेले किसी बड़े सांस्कृतिक कुंभ से कम नहीं होते।
​दूर-दराज के गाँवों से युवक-युवतियाँ अपनी पारंपरिक वेशभूषा में सज-धज कर टोलियों में निकलते हैं। चांदी के हंसली, कड़े और बोर जैसे आभूषणों से लदी युवतियाँ और सिर पर साफा बाँधे हाथ में तीर-कमान या बाँसुरी लिए युवक। यह दृश्य किसी महान कलाकार की पेंटिंग जैसा प्रतीत होता है। यहाँ पहनावा केवल शरीर ढंकने का साधन नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक विरासत का एक गौरवशाली हिस्सा है।
​भगोरिया की सबसे चर्चित और अक्सर गलत समझी जाने वाली परंपरा है जीवनसाथी का चुनाव। लोग इसे ‘भागने’ का मेला कहते हैं, लेकिन असल में यह ‘चुनने’ और ‘स्वीकारने’ की एक बेहद खूबसूरत सामाजिक व्यवस्था है।
​परंपरा के अनुसार, यदि कोई युवक किसी युवती को ‘पान’ भेंट करता है और युवती उसे स्वीकार कर लेती है, तो यह उनके आपसी प्रेम का मूक संकेत होता है। कई जगहों पर गुलाल लगाने की भी परंपरा है। यह प्रेम की वह सहज और सार्वजनिक स्वीकृति है। इसके बाद होने वाले सामाजिक रीति-रिवाज उनके रिश्ते को विवाह की पवित्रता में बदल देते हैं। दरअसल यह परंपरा हमें सिखाती है कि प्रेम में जबरदस्ती नहीं, बल्कि आपसी सहमति की खुशबू होनी चाहिए।
​लोक श्रुतियों के अनुसार, भगोरिया का इतिहास राजा भोज के समय से जुड़ा है। माना जाता है कि दो भील राजाओं, कासूमार और बालून ने भागोर नामक स्थान पर इस मेले की शुरुआत की थी। धीरे-धीरे यह परंपरा आसपास के क्षेत्रों में फैल गई और ‘भागोरिया’ के नाम से अमर हो गई। ऐतिहासिक प्रमाण चाहे जो भी कहें, लेकिन भील समाज के लिए यह उनकी वीरता और पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट करने का एक माध्यम भी है।
​आज जब हम 2026 के पायदान पर खड़े हैं, भगोरिया के सामने कई चुनौतियां हैं। सेल्फी संस्कृति और सोशल मीडिया के प्रभाव ने मेलों की निजता को थोड़ा प्रभावित किया है। बाज़ारी ताकतों ने स्वदेशी हाटों की जगह प्लास्टिक और बनावटी वस्तुओं को बढ़ावा दिया है।
​किंतु, प्रशंसा करनी होगी उस आदिवासी युवा की, जो उच्च शिक्षा प्राप्त करने और शहरों में नौकरी करने के बावजूद, भगोरिया के इन सात दिनों में अपने गाँव लौट आता है। वह कोट-पैंट उतारकर अपनी पारंपरिक पोशाक पहनता है और मांदल की थाप पर पूरी शिद्दत से थिरकता है।
​भगोरिया केवल आदिवासियों का पर्व नहीं है, यह समूचे भारत की सांस्कृतिक विविधता का गौरव है। यह हमें याद दिलाता है कि मिट्टी से जुड़ाव ही इंसान को आसमान छूने की ताकत देता है।
​प्रशासन और नागरिक समाज का यह दायित्व है कि हम इस उत्सव की मौलिकता को बचाए रखें। हमें पर्यटन के नाम पर इसे ‘तमाशा’ बनने से रोकना होगा और इसकी सांस्कृतिक शुचिता को बनाए रखना होगा। जब भी फाल्गुन की हवा में रंगों की आहट होती है, मुझे झाबुआ की वे पगडंडियाँ याद आती हैं। भगोरिया जीवन का वह राग है, जो हमें सिखाता है कि अभावों में भी कैसे भरपूर जिया जाता है। यह उत्सव है साहस का, सामूहिकता का और उस चिरंतन प्रेम का जो सदियों से इस मिट्टी में बसा है। (विनायक फीचर्स)

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