भटक रहें बेकदर शहर में,
कहाँ ठिकाना यहाँ नजर में।
मिले सहारा यहीं तमन्ना,
नया मुसाफिर बनें इधर में।
हवा यहाँ पर करें शरारत,
कहाँ इनायत रहें लहर में।
किसे पुकारें किसे बुलायें,
दिखे न कोई घनें बदर में।
चले अकेले हजार दुश्मन,
डरा रहें हर जगह डगर में।
बहार रूठी नहीं किनारा,
खुशी कराहें लगें हहर में।
तमस छँटे हो जरा उजाला,
दुआ गुजारिश नहीं असर में।
– अनिरुद्ध कुमार सिंह
धनबाद, झारखंड
