मुझे
मिली एक दिवस,
बुद्ध की पाती….,
और पढ़के आनंद से, आत्मविभोर हो गया !!1!!
मुझे
पता नहीं था,
कि, बहे अंतस झरना…,
और स्वयं से मिलके, तरबतर हो गया !!2!!
बस
देख जानके तथागत,
पाया जीवन का पथ….,
और स्वयं से स्वयं, साक्षात्कार हो गया !!3!!
शांति
बसे मन माहिं,
अजस्त्र बहे आनंद निर्झर…,
और निमग्न प्रेम में, खोता चला गया !!4!!
पढ़ लें
जब, स्वयं को
फिर न बाहर भटकें…,
और शुद्धात्मा में समाए, बुद्ध हो गया !!5!!
– सुनील गुप्ता (सुनीलानंद), जयपुर, राजस्थान
