आज बादल थम नहीं रहें हैं,
घनघोर बरस रहें हैं,
कौन विरही मन छलक पड़ा होगा,
काले मेघों का क्रोध बरसा,
आकाश के घात से बिखरा,
विश्वास का झीना दुपट्टा,
फेंक कर कौन चल पड़ा होगा,
बहा कर उपेक्षा के धुलि रज,
पंकिल पंकज प्रमुदित हुआ,
कौन पर्ण अवलंबित पड़ा होगा,
– रश्मि मृदुलिका, देहरादून, उत्तराखंड
